स्वामी वामदेवजी के साथ संघ विहिप द्धारा राम मंदिर विषय मे किया गया छल

#सनातनी_होने_के_नाते_अवश्य_पढ़ें। #षड्यंत्र_को_समझे 30 अक्टूबर 1990 की भयानक रात में पुलिस की गोलियों से बलिदान हुए कारसेवकों के शव गली-गली में बिखरे पड़े थे | इस आतंक काल में सारस्वत ब्राह्मण कुलसमुत्पन्न "स्वामी वामदेव जी महाराज" के अयोध्या निवास आश्रम में प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में जगे शिष्यों ने पाया कि वामदेवजी महाराज आश्रम में नहीं है | कहाँ चले गये ? कहीं प्रशासन ने तो गायब नहीं कर दिया ? सब ढूंढने चल पड़े | बहुत समय ढूंढने पर अयोध्या की सन्नाटे वाली गलियों में लाठी की आवाज करते वे संत चल रहे थे | शिष्यों ने देखकर हर्ष से कहा- यहाँ आप अकेले ? सरकार आपके पीछे पड़ी है | कुछ हो जाता तो ? महाराज बोले- "नारायण ! मैं रात को इन पवित्र शवों की रक्षा करता रहा, जिससे गली के कुत्ते इन शवों को नोच न पाये |" रामजन्मभूमि आन्दोलन के मुख्य नेतृत्वकर्ता स्वामी वामदेवजी महाराज एक ऐसी विभूति थे, जिनका दुरुपयोग करके संघ, विश्व हिन्दु परिषद् आदि कथित हिन्दु संगठनों ने ऐसा कुटिल जाल रचा, जिससे राममंदिर आन्दोलन का नेतृत्व संतों से हटकर इन राजनेताओं के पास आ गया | वामदेवजी महाराज धर्मसम्राट् स्वामी श्री करपात्रीजी महाराज के शिष्य थे | पूर्ण निष्काम संत की प्रसिद्धि जगत् में "विरक्तशिरोमणि" की थी | वे पूज्य श्री अखण्डानन्द जी महाराज के आश्रम में निवास करते थे | गुरुदेव (पुरी शंकराचार्य महाभाग) भी शंकराचार्य पीठारोहण से पूर्व उसी आश्रम में निवास और नित्य प्रवचन करते थे | शंकराचार्य भगवान् द्वारा देश की दुर्दशा पर प्रवचन सुन-सुनकर वे विरक्त संत भी लोकसंग्रह हेतु उद्यत हो गये | एक दिन उन्होंने अपने कक्ष में स्वामी निश्चलानन्दजी से कहा - जब धर्मसम्राट् महाभाग थे, तब केवल आज्ञा समझकर उनके कार्य का सम्पादन कर देता था | अब जब देश की दुर्गति पर ध्यान जाता है, तब रोने की स्थिति आती है, क्योंकि तब हमने कुछ नहीं किया | अब तो हमने अपना मार्गदर्शक खो दिया | विश्वहिन्दुपरिषद् के अशोक सिंघल जी स्वामी वामदेव जी से मिलने आये | स्वामीजी ने कहा- आपने मेरे पूज्य गुरुदेव धर्मसम्राट् स्वामी श्री करपात्री जी महाभाग को धोखा दिया | आप मुझे धोखा नहीं देंगे, यह कैसे समझूँ ? अशोक सिंघल जी ने कहा- हमने उनको अवश्य धोखा दिया | परन्तु हम पर विश्वास कीजिये, आपको हम धोखा नहीं देंगे | स्वामी वामदेव मानने लगे थे कि हमारे पास संघबल नहीं है, अतः हम पंगु हैं | वहीं इन संघ, विहिप के पास आध्यात्मिक नेत्र न होने से वे अंधे हैं | अतः उनको नेत्र चाहिये, हमको पैर | हम इनमें घुसकर इसका शोधन कर लेंगें | स्वामी निश्चलानन्द जी ने चेतावनी दी- आपने स्वयं को पंगु स्वीकार ही लिया है | बाद में सबको कोर्ट कचहरी का मामला बताकर आपको अन्धा भी वो सिद्ध कर ही लेंगें | आप स्वयं को जिन आध्यात्मिक नेत्रों वाला मानते हैं, वो नेत्र उन्हें बिल्कुल नहीं चाहिये | उनका तो यही प्रकल्प है- रोटी-बेटी एक करके हिन्दुओं को बचाओ | स्वामी वामदेव जी ने कहा- जब ऐसी स्थिति आयेगी, तब मैं पृथक् हो जाऊँगा | ऐसा विचार कर वे विश्वहिन्दुपरिषद् की मंच की शोभा बढ़ाने लगे | धर्मसम्राट् महाभाग सन् 1982 में ही ब्रह्मलीन हो चुके थे | अब दो वर्षों बाद उन विषयों पर राजनीति खेलने के लिये संघ लालायित था | इस प्रवाह को सुगम करने में स्वामी वामदेवजी के उपयोग और विनियोग होने लगा | संघ का पूरा बल स्वामीजी की सेवा में था | कुम्भ मेला समीप आया | स्वामी वामदेव जी ने धर्मरक्षा हेतु कुम्भ मेले का अवसर उचित लगा | उनके आग्रह पर संघ का एक प्रचारक उनकी सेवा में लगा दिया गया | कुम्भ मेले में स्वामी वामदेव के आदेशानुसार कार्य करते थे | स्वामीजी हर सुबह कुछ संतों की एक सूची देते थे | शाह अपनी साइकिल लेकर उन संतों के पांडालों में जाकर स्वामी वामदेव की ओर से बात करते थे और विहिप के अधीन कार्य करने हेतु प्रेरित करते थे | यह सिलसिला चलता रहा और धीरे-धीरे संत समाज स्वामी वामदेव जी के आग्रह पर विहिप की योजनाओं का हिस्सा होने लगे | अयोध्या में विवादास्पद् ढाँचा टूटा, केन्द्र में भाजपा सरकार बनाने की सीढ़ी चढ़ने लगी | मार्गदर्शक स्वयं को अनुपालक मानने लग गये | दिन रात परिश्रम के ग्यारह वर्ष बीत गये | उस समय तक दण्डी स्वामी निश्चलानन्दजी भी शंकराचार्य पद पर आसीन हो चुके थे | अब अशोक सिंघल जी आदि को वामदेवजी की कोई आवश्यकता नहीं थी | मंदिर बने, न बने, भाजपा सत्ताधारी थी | संघ का शोधन तो दूर रहा, पूरे शास्त्रीय संत जगत् अब संघी संत जगत् की तरह कार्य करने लगा था | तब शंकराचार्य महाभाग को स्वामी वामदेवजी ने अपनी वेदना व्यक्त करते हुए कहा- धोखा, धोखा, बस केवल धोखा | यह कहते हुए उनका गला अवरुद्ध हो गया | उन विरक्तशिरोमणि के लोकसंग्रह का विपरीत प्रभाव पश्चाताप के रूप में दिखायी दे रहा था | पुनः कुछ देर बाद उन्होंने कहा- मैने दिल्ली में पढ़ा और सुना था कि आपने आदित्यवाहिनी की स्थापना की है | मैं स्वस्थ होता, तो सब तरह से साथ देता | अब तो मेरी शुभकामना ही आपके साथ है | इस चर्चा के तीन माह पश्चात् ही वे ब्रह्मलीन हो गये | श्री शंकराचार्य महाभाग ने जलप्रवाह से षोडशीपर्यन्त कृत्यों का सम्पादन अपनी देखरेख में शास्त्रीयविधा से करवाया | आज शांकर परम्परा के दशनामी संन्यासी स्वामी वामदेव की आभा को नष्ट कर संघ ने उन्हें संघी संन्यासी सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी | उनके मूल इतिहास को तिरोहित कर दिया गया और मनगढ़ंत कहानियाँ गढकर उन्हें संघी संत सिद्ध किया जाता रहा है | यह कहानी है एक संत द्वारा एक अशास्त्रीय संगठन के शोधन का... आज भाजपा कि सत्ता है। व्यापारी मिडिया से मिलकर सेंकडो कालनेमि नकली संकराचार्य देश मे घुमाये जा रहे है। अब उन्हे पता है कि हिंदु हमारी मुठ्ठी मे है। शास्त्र ज्ञान अभाव मे सनातनी हिंदुओं को जिस दिशा मे ले जाना होगा ले जायेंगे। केस लडने वाले शंकराचार्य निर्मोही अखाडा हिंदुमहासभा तीनो पक्षकार सुप्रीम कोर्ट के फेंसले के बाद राम मंदिर निर्माण के कार्य से दुर कर दिये गये। कमलेश तिवारी हिंदु महासभा के अध्यक्ष कि तो हत्या तक कर दी गयी है। संघ विहिप एवं उनके कालनेमि साधु संतो ने सरकार कि मदद से राम मंदिर ट्रस्ट मे स्थान हांसिल कर दिया। यही कारण है कि आज शास्त्रीय नियमो कि धज्जिया उडाकर अयोध्या मे आज राम मंदिर नही संघ विहिप भाजपा का कार्यलय बन रहा है। लेकिन याद रहे *काल के गर्भ मे सभी का न्याय है।* नारायण हर हर महादेव

Comments

Popular posts from this blog

जगद्गुरु  शंकराचार्य निश्चालानंद सरस्वती परिचय

शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद द्धारा राम मंदिर के लिए दिया गया महत्वपूर्ण प्रमाण

शंकराचार्य ने राम मंदिर कैसे प्राप्त किया