५०० वर्षों तक तुम्हारे शङ्कराचार्य और तुम सब शास्त्रवादी कहाँ थे? तब क्यों शास्त्रविधि से मन्दिर बनवाकर प्राणप्रतिष्ठा नहीं करवा ली? अब जब सबकुछ अच्छा हो रहा है, तो तुम शास्त्र बीच में ला रहे हो।
#प्रलाप– ५०० वर्षों तक तुम्हारे शङ्कराचार्य और तुम सब शास्त्रवादी कहाँ थे? तब क्यों शास्त्रविधि से मन्दिर बनवाकर प्राणप्रतिष्ठा नहीं करवा ली? अब जब सबकुछ अच्छा हो रहा है, तो तुम शास्त्र बीच में ला रहे हो।
#धज्जियाँ–
किसी स्त्री को उसके पति के द्वारा ५ वर्षों से प्रयत्न करने पर भी पुत्रप्राप्ति नहीं हो पा रही हो, तो कोई परपुरुष उस स्त्री से बलात्कार करके गर्भाधान करने का अधिकारी स्वप्न में भी नहीं हो सकता।
देशकालनिमित्तवशात् श्रीदशरथादि महासमर्थ पुरुषों को भी सहस्रों वर्षों से पुत्रप्राप्ति नहीं हो पाई थी, अतः कैसा आश्चर्य। यदि पुरुष में कोई समस्या हो भी, तो मणि, मन्त्र, औषधि, यज्ञ, दान, तप, व्रत आदि से समस्या नष्ट हो सकती है।
परपुरुष द्वारा बलपूर्वक मैथुन और उसे गर्भाधान का नाम देना तो हर स्थिति में महापाप ही है।
तुम प्रलापियों की पुत्रियों का ३० वर्ष की आयु तक भी विवाह न हो पाया हो, तब कोई उनसे बलपूर्वक मैथुन कर ले, तो तुम सम्भवतः प्रसन्न हो जाओगे, ना कि अपने अपने कुलों की मानमर्यादा और धार्मिक नियमों का हवाला देकर विरोध करोगे।
अन्यथा तुम्हारे ही पूर्वोक्त मतानुसार बलात्कारियों द्वारा कहा जायेगा कि "३० वर्षों तक तुम कहाँ थे? तुम्हारे कुलों और धर्म वाले कहाँ थे? तब क्यों मानमर्यादा, कुल और धर्म के नियम के अनुसार पुत्री के लिए पुरुष देखकर उसके लिए सम्भोग की व्यवस्था नहीं की? अब जब मैंने बलपूर्वक तुम्हारी पुत्री को रतिसुख प्रदान करके आनन्दित किया है, तो तुम मानमर्यादा और धर्म के नियम बीच में ला रहे हो।"
किसी की पुत्री ३० तो क्या ३०००० वर्षों तक भी कुँवारी रहने पर भी और कोई विवाहित स्त्री ५००००० वर्षों से सन्तानहीन होनेपर भी अवैध सम्भोग और बलात्कार की पात्र नहीं हो जाती। उसके साथ ऐसा कुछ करने का विचार भी अपराध ही है। उस स्त्री का अपने शरीर पर पूरा अधिकार है। उसके पिताभ्रातादि विधिपूर्वक उसका विवाह कराने के अधिकारी हैं। पति ही मैथुन और गर्भाधान का अधिकारी है। अन्य कोई बलपूर्वक या छलपूर्वक उसके साथ मैथुन का अधिकारी नहीं हो जाता, अपितु ऐसा करने पर वह दण्डनीय होता है।
उसी प्रकार ५०० वर्ष तो क्या, ५०० कल्पों तक भी यदि हमारी पुण्यभूमियों, देवालयों, तीर्थों पर म्लेच्छों ने आधिपत्य कर लिया हो, तो भी किसी अन्य का कोई अधिकार नहीं बनता कि उनकी शास्त्रोक्त मर्यादा के विरुद्ध जाकर धर्म के नामपर कुछ भी कर डाले। देशकालनिमित्तविशेष के कारण अधिकारीजन यदि अल्पसंख्यक अथवा शक्तिहीन अथवा पराजित अथवा पराधीन अथवा अकर्मण्य अथवा लुप्त अथवा नष्ट भी हो गए हों, तो भी अनधिकारी का अधिकार लेशमात्र भी नहीं हो सकता। करोड़ों कल्पों तक भी पराधीन रह चुके व्यक्ति को भी अपने अस्तित्त्व और उपयोगिता के सर्वविध रक्षण का अधिकार है, कोई अन्य उसे मुक्त कराने के नामपर उस पराधीन व्यक्ति के किसी भी व्यवहार में प्रतिकूल हस्तक्षेप का अधिकारी नहीं है।
परन्तु तुझ जैसे निभोगानन्दी, आईवीएफ सेरोगेसी की पैदाइश, परस्त्रीगामी, समलैङ्गिक, धर्महीन चड्डीगेङ्ग के मानसपुत्रों के लिए अविवाहित, विवाहित, विधवा आदि सबसे बलपूर्वक मैथुन, बलपूर्वक विवाह, बलपूर्वक गर्भाधान आदि सब महान् धर्म होंगे, तभी ऐसा प्रलाप कर रहे हो।
वैसे शंकराचार्यो का राम मंदिर मे क्या योगदान रहा है यह तुम अनपढ गवांर वोट्सअप युनिवर्सिटी से स्नातक क्या ही जानोगे ???
॥ नमश्चण्डिकायै ॥
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