शंकराचार्य को क्या अधिकार मिले हैं और उनकी जिम्मेदारी क्या होती हैं??
★★शंकराचार्य को क्या अधिकार मिले हैं और उनकी जिम्मेदारी क्या होती हैं?? क्या प्रत्येक सामाजिक समस्या के लिए शंकराचार्य को दोषी कहना उचित हैं?★★
सनातनी सज्जनों पिछले लेख में मैंने आपको श्रीमदाद्यजगद्गुरु शंकराचार्य के द्वारा सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा के विषय मे बताया उनके इतिहास के विषय मे बताया और यह भी बताया कि शंकराचार्य ने कैसे संसार पर विजय प्राप्त कर जगद्गुरु पद पर प्रतिष्ठित हुए फिर उन्होंने 4 दिशाओं में 4 धर्मराजधानियाँ बनाई और जिसपे चार धर्मसम्राटों को अभिषिक्त कर दिया और कह दिया मेरे द्वारा बताए गए लक्षणों से युक्त इन पीठों पर बैठे सन्यासी को मेरा नाम उपयोग करने का अधिकार देता हूँ और इनके माध्यम से मैं ही अभिव्यक्त होता रहूँगा इसलिए जनता यही समझे कि इन पीठों के आचार्यों में मैं शंकराचार्य स्वयं हूँ। इसलिए आज इन चारों पीठों पर अभिषिक्त सन्यासियों को शंकराचार्य कहा जाता है। शंकराचार्य ही सनातन धर्म के सर्वोच्च अभिभावक या नेता या गुरु हैं अतः जो व्यक्ति जिस शंकराचार्य पीठ के क्षेत्र में आता है वो व्यक्ति उस पीठाधीश्वर को गुरु मानकर उनके अनुसार चले। यह सब मैंने पिछले लेख में प्रमाणों के साथ लिखा।
अब जैसा कि आप सभी जानते हैं कि आजकल हर बात के लिए कुछ क्षद्महिन्दुवादी धूर्त अधर्मी नेता संगठन और उनके प्रायोजित कार्यकर्ता आमजनता को धर्म के नाम पर मूर्ख बनाकर वोट और नोट ले लेते है फिर जब जनता उनसे कार्य पूछती है तो वो अपने बचने के लिए शंकराचार्य पर आरोप लगा देते हैं और न केवल धर्म सम्बन्धित विषयों के लिए बल्कि समाज मे नेताओं के द्वारा फैलाये आपसी जातीय द्वेष, गरीबी, अशिक्षा, विधर्मियों के द्वारा हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार आदि विषयों पर भी स्वयं बचने के लिए शंकराचार्य को दोषी ठहरा देते हैं इन सब बातों को मूर्ख हिन्दू बिना विचारे शंकराचार्य को दोषी मान लेती है जबकि मूर्ख लोग सोचते भी नही कि वो जिस बात को लेकर वो आचार्य को दोषी ठहरा रहे हैं क्या वास्तव में उसके जिम्मेदार शंकराचार्य होते हैं आखिर क्या यह सब शंकराचार्य का कार्य होता है ?
इसलिए आज जानते हैं कि आखिर शंकराचार्य को अधिकार क्या मिले हैं और शंकराचार्य के कार्य क्या होते हैं?
साथियों आज भी जब आप कोई संस्था ट्रस्ट सोसायटी बनाते हैं तो उसके संविधान लिखते हैं। उस संविधान में पदाधिकारियों के अधिकार और दायित्व लिखे जाते हैं उसे सरकार से पंजीकृत कराना पड़ता है और आप यदि संस्था के नियमों के विरुद्ध जाते हैं तो वो एक प्रकार से अपराध होता है गैर कानूनी होता है। भविष्य के सभी कार्यों और विवादों का समाधान भी इसी संविधान के हिसाब से करना पड़ता है।
ठीक इसी प्रकार 2500 वर्ष पूर्व आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने अपने चार दिशाओं में चार शांकर पीठ बनाये हैं और उन पीठों के लिए एक संविधान बनाया है जिसे "मठाम्नाय महानुशासनम्" कहते हैं। यह महानुशासनम् शंकराचार्यों के अधिकार और दायित्व तय करता है। जिसे उस समय के भारत के चक्रवर्ती राजा ने "ताम्रपत्र शासनादेश विज्ञप्ति" जारी कर के शंकराचार्य के मठों और उसके संविधान को मान्यता दे दी उस समय राजा का वचन ही कानून होता था। अगर आप "मठाम्नाय महानुशासनम्" और महाराज सुधन्वा का "ताम्रपत्र शासनादेश विज्ञप्ति" मात्र ही पढ़ लें तो भी आपको उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगे।
आइये देखते हैं आद्य जगद्गुरु ने वर्तमान शंकराचार्यों को क्या अधिकार और कर्तव्य दिए हैं-
आम्नायाः कथिता ह्येते यतिनां च पृथक् पृथक् ।
तैः सर्वैश्चतुराचार्यैर्नियोगेन यथाक्रमम् ॥
प्रयोक्ततव्याः स्वधर्मेषु शासनीयास्ततोऽन्यथा ।
कुर्वन्तु एव सततमटनं धरणीतले ॥
सन्यासियों के ये( चार ) आम्नाय अलग-अलग कहे गए हैं उन (में स्थापित) सभी चारों आचार्यों को चाहिए कि (अपने-अपने मठाम्नाय की सीमा में आने वाले जनता) को स्वधर्म का आचरण करावें। उस (स्वधर्माचरण से) अन्यथा आचरण करने वाले को अनुशासित करें। निरंतर अपने क्षेत्र में भ्रमण अवश्य करते रहें।
★आज के समय स्वधर्म की बहुत हानि हो चुकी हैं ऐसा नही है कि आचार्य स्वधर्म का उपदेश नही करते। आचार्य तो स्वधर्म की शिक्षा तो देते ही हैं पर आचार्य किसी से जबरदस्ती धर्म पालन तो नही करवा सकतें। रही बात भ्रमण की तो आचार्य निरन्तर भ्रमण करते हैं। चारों पीठों के आचार्य भ्रमण करते हैं वही कुछ आचार्यों ने अपने शिष्य प्रतिनिधि तैयार कर रखें है जो आचार्य कोटि के सन्यासी ही हैं ये सभी शिष्य भी भ्रमण करते रहते हैं और जनता को धर्म का उपदेश करते हैं।
वर्णाश्रमसदाचारा अस्माभिर्ये प्रसाधिताः ।
रक्षणीयाः सदैवैते स्व-स्व भागे यथाविधि ॥
मैंने जिस वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था स्थिर की है उसे अपने-अपने क्षेत्र में सदा यथावत् सुरक्षित रखना चाहिए।
★आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य आज से 2500 वर्ष पूर्व अपने पीठों की स्थापना करके जिस जन्मना वर्णाश्रम की मर्यादा बनाये रखने की बात कही है उस जन्मना वर्णाश्रम की शिक्षा परम्परा से सभी शंकराचार्य अपने धार्मिक प्रजा को देते आये हैं। इसलिए घोर वर्णाश्रम विरोधी आजकल ये धूर्त क्षद्महिन्दुवादी संगठन के लोग दिन रात शंकराचार्यों का अपमान करते रहते हैं क्योंकि ये सब स्वयं पापकर्म से उत्पन्न वर्णसंकर हैं।
सुधन्वनः समौत्सुक्यनिवृत्यै धर्म-हेतवे ।
देवराजोपचारांश्च यथावदनुपालयेत् ॥
सम्राट सुधन्वा की उत्कण्ठा की शान्ति तथा धर्म की रक्षा के लिये (शंकराचार्यों को चाहिए कि वे) देवराज इन्द्र की (भांति ही समस्त) उपचारों (राजचिन्हों -छत्र, चामर, सिंहासना आदि) को यथावत् धारण करें।
★राजा सुधन्वा ने भगवान् आद्यशंकराचार्य जी से प्रार्थना की थी कि वह कृपया राजचिन्ह धारण करें। धर्म की स्थापना के उद्देश्य से ही चार पीठों पर चार शंकराचार्यों का अभिषेक किया जाता है। चारों पीठाचार्य धर्म के शासक हैं। अतः उन्हें सम्राट् की भाँति राजचिन्हों को धारण करना चाहिए, तभी सामान्य जनों पर उनके व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि भगवान् आद्यशंकराचार्य ने भावी पीठाचार्यों के लिए यह व्यवस्था दी है। अतः इस आदेश का पालन भी सभी शंकराचार्य करते ही हैं।
चातुर्वर्ण्यं यथायोग्यं वाङ्मनः कायकर्मभिः ।
गुरोः पीठं समर्चेत विभागानुक्रमेण वै ॥
चारों वर्णों (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शुद्र) की जनता को चाहिए कि मनसा, वाचा, कर्मणा, अपने-अपने सम्बन्धित गुरुपीठ की पूजा करें।
★ आज की स्थिति देख लीजिए जनता अपना कर्तव्य भूल गयी आचार्यों की बात माननी नही है बस आचार्यों पर दोषारोपण करना है।
धरामालम्ब्य राजानः प्रजाभ्यः करभागिनः ।
कृताधिकारा आचार्या धर्मतस्तद्वदेव हि ॥
जिस प्रकार अधिकार सम्पन्न राजा अपनी प्रजा से कर लेने के अधिकारी हैं उसी प्रकार अधिकार प्राप्त किए हुए पीठाधीश्वर (शंकराचार्य) भी धर्मानुसार कर ग्रहण करने के अधिकारी हैं।
★अब आप देखिए कि शंकराचार्य ने जो सिद्धान्त बनाया उसे भारत के सम्राट सुधन्वा ने भी मानने का आदेश दिया है पर क्या आज प्रजातन्त्र में प्रजा ने शंकराचार्य को कर देती है? भारत की डेमोक्रेटिक सरकार (फर्जी लोकतान्त्रिक सरकार) जो धार्मिक न होकर घोर धर्म विरोधी है, लुटेरी है चोर है उसे तो जनता खूब कर देती है। लुटेरे, हत्यारे, धर्मद्रोही राजनेताओं की पूजा करना आजके जनता का स्वभाव हो गया है पर यदि शंकराचार्य अपने निजी शिष्यों से भी दान लेकर अपना कार्य करें तो यह दुष्ट समाज उनके ऊपर तरह तरह के आरोप लगाती है। फिर ऐसे समाज को क्या अधिकार है कि वो समाज मे हो रहे किसी भी प्रकार के विनाश के लिए शंकराचार्यों को दोषी ठहराए?
धर्मो मूलं मनुष्याणां स चाचार्यावलम्बनः । तस्मादाचार्यसुमणेः शासनं सर्वतोऽधिकम् ॥
मनुष्य का मूल धर्म है वह आचार्य पर निर्भर है (क्योंकि सामान्य मनुष्यों को धर्म के तत्वों का ज्ञान नहीं होता, आचार्य अपने उपदेशों से लोगों को कर्तव्य कर्म के प्रवृत्ति और अकर्तव्य से निवृत्ति की शिक्षा देते हैं) इसलिए आचार्यरूपी अनमोल मणि का शासन सर्वोपरि है।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शासनं सर्वसम्मतम् ।
आचार्यस्य विशेषेण ह्यौदार्यभरभागिनः ॥
अतः सर्वतोभावेन उदारतासम्पन्न आचार्य का शासन विशेष रूप से सभी को मानना चाहिए।
★आद्य जगद्गुरु का आदेश है कि आचार्य का शासन सभी को मानना चाहिए क्योंकि आचार्य का शासन सर्वोच्च है। यही आदेश भारत के राजा ने भी दिया हुआ है
सुधन्वा कहते हैं- भगवदाज्ञासमवबुद्धस्समस्तैरथास्मदादिब्रह्मक्षत्रादिवंशोद्भवैः परमप्रेम्णोत्तमाङ्गेनाद्रियत इति।
अर्थात- भगवत्पाद के आज्ञानुसार नियमों में बँधे हुए हम सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वंशो में उत्पन्न हुए लोग परमप्रेम से इस आज्ञा को स्वीकार करते हैं।
अब आप निष्पक्ष लोग बताइये क्या जनता शंकराचार्य का धार्मिक शासन मानती है? जबकि भारत की परम्परा में तो राजा को भी शंकराचार्य का आदेश मानना पड़ता था और आज ये दुष्ट शासन तन्त्र अनेक नकली शंकराचार्य बनाकर घुमा रही है और धर्म के क्षेत्र पर कब्जा जमा रही है मन्दिरों के धन को लूट रही है। फिर इनके अनुयाइयों को शंकराचार्य से प्रश्न करने का क्या अधिकार है? ये इसलिए प्रश्न करते है क्योंकि ये भोली भाली जनता को मूर्ख बनाकर आचार्य परम्परा और सनातन धर्म को नष्ट कर देना चाहते हैं।
आचार्याक्षिप्त दण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥
मनुष्य पापकर्मों को करके आचार्य द्वारा निर्धारित दण्ड (प्रायश्चित) भोगकर शुद्ध हो जाते हैं तथा पुण्यात्माओं की भाँति स्वर्ग जाते हैं।
★आप स्वयं देखिए कि सनातन धर्म मे यहाँ तक व्यवस्था है कि यदि किसी से कोई पापकर्म हुआ है तो आचार्य के द्वारा बताए प्रायश्चित को स्वीकार करने से वो पापमुक्त हो जाता है और नर्क के बजाय स्वर्ग चला जाता है अर्थात यमराज के ऊपर भी आचार्य का शासन चलता है जबकि ये धूर्त संघी रोज हमारे पूज्य आचार्यों को दण्ड देने की बात करते हैं। इनको गालियां देते हैं अतः इनका यदि वध कर दिया जाए तो यह भी पुण्य का कार्य ही होगा। क्योंकि गुरुद्रोही, गौद्रोही, धर्मद्रोही, राष्ट्रद्रोही वध करने योग्य ही हैं।
इत्येवं मनुरप्याह गौतमोऽपि विशेषतः । विशिष्टशिष्टाचारोऽपि मूलादेव प्रसिद्ध्यति ॥
तानाचार्योपदेशांश्च राजदण्डांश्च पालयेत् । तस्मादाचार्यराजानावनवद्यौ न निन्दयेत् ॥
आचार्य के उन उपदेशों तथा राजा के द्वारा दिए गए दंड को लोगों को स्वीकार करना चाहिए अतः आचार्य और राजा दोनों ही शुद्ध और पवित्र हैं उनकी निंदा कभी नहीं करनी चाहिए।
★आज भारत में राजा का शासन नही है उनके जगह पर अवैदिक अधर्मी लोगों का डेमोक्रेटिक शासन देश पर चल रहा है जो एक प्रकार से लूट तन्त्र है। आचार्य की सबसे ज्यादा निन्दा ये आर्यसमाजी, संघी भाजपायी कर रहे हैं जो शासन में बैठे हैं और इन्हें यदि भारत की जनता इन दुष्ट पापी सत्ता धारियों का सम्मान कर रही है तो ऐसे पार्टी नेता भक्त जनता का विनाश कौन रोक सकता है भला?
धर्मस्य पद्धतिर्ह्येषा जगतः स्थितिहेत्वे ।
सर्ववर्णाश्रमाणां हि यथाशास्त्रं विधीयते ॥६३॥
संसार की रक्षा के कारण धर्म का यह मार्ग सभी वर्णो तथा आश्रमों के लोगों के लिए शास्त्र की मर्यादा के अनुसार निर्धारित किया गया है।
★अब जब आचार्य द्वारा निर्धारित धर्म मार्ग पर जनता स्वयं नही चलेगी तो ऐसे जनता की रक्षा क्या संभव है? आचार्यों के बताए मार्ग पे न चलकर उनकी और उनके मार्ग की निंदा अपमान करने वाले किस मुख से धर्म और राष्ट्र की बात करते हैं? और अंधभक्त जनता क्यों इन दुष्ट अधर्मी नेताओं को सर पर बैठाती है?
कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायामृषीसत्तमः ।
द्वापरे व्यास एव स्यात् कलावत्र भवाम्यहम् ॥
कलयुग में शंकराचार्य ही जगद्गुरु हैं पर शंकराचार्य को मानने के बजाय आज भारतीय शासन ने अनेकों कालनेमियों नकली शंकराचार्यों की फौज खड़ा कर दी है ऐसे धूर्तों को असली मान्य पूज्य शंकराचार्यों पर प्रश्न करने का क्या अधिकार है?
उपर्युक्त आदेशों को पढ़कर आपको पता चल गया होगा कि शंकराचार्य का क्या कार्य है? शंकराचार्य अपना कार्य बहुत निष्ठा से करते हैं पर शासन और जनता का काम है शंकराचार्यों का आदेश माने जबकि वो आदेश मानती नही मनवाना चाहती है ऐसे में शंकराचार्यों पर किसी भी प्रकार का आरोप लगाने का अधिकार पार्टी भक्त चाटुकार लोगों को नही हैं।
जनता के लिए जीविका, स्वास्थ्य, सुरक्षा, न्याय, सम्मान की व्यवस्था करने का दायित्व उन सत्ताधारियों का है जो जनता से आयकर(टैक्स) लेती हैं जो जनता को दण्ड देती हैं चूंकि शंकराचार्य किसी प्रकार का कर नही लेते और शंकराचार्यों का दण्ड जनता के ऊपर लागू (यमलोक में लागू होता है) नही होता इसलिए जनता को अपने किसी भी समस्या के लिए शंकराचार्य को दोषी ठहराने का अधिकार नही है। शंकराचार्य आपके लिए धर्म का उपदेश कर रहे हैं यही आपके ऊपर बहुत कृपा कर दे रहे हैं। अपने सर्वोच्च आचार्य, गुरु का सम्मान न करने वाले लोगों का विनाश होता ही है और होता रहेगा जबतक जनता इन आचार्यों से छमा मांगकर इनके आदेशों का पालन करते हुए धर्म मार्ग पर न चले।
अस्तु
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✍️दीपक कुमार केशरी
#सनातनी
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