राम मन्दिर शिलान्यास यह बात बहुत कम लोगों को पता होगी पूरी पढ़ें

★★यह बात बहुत कम लोगों को पता होगी पूरी पढ़ें।★★ ★★अयोध्या में #9_नवम्बर_1989 में राम मन्दिर शिलान्यास के मामले में किस प्रकार #राजीव_गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने दिसम्बर 1989 के लोकसभा चुनाव में वोट पाने के लालच में #विश्व_हिंदू_परिषद् के साथ मिलकर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज एवं हिन्दू धर्म के साथ गद्दारी किया और किस प्रकार राजीव गांधी 1989 में बुरी तरह चुनाव हार गए और फिर कभी प्रधानमंत्री नही बन सकें और आज तक उनके पत्नी और बच्चे किस प्रकार उन्ही संघी भाजपाइयों द्वारा गाली खा रहे हैं जिनके साथ मिलकर राजीव गाँधी ने शंकराचार्य जी के साथ षड़यन्त्र किया? यह हम सबको पढ़ना चाहिए।★★ यहाँ 4 पक्ष हैं। 1.मूल सनातन धर्म के सर्वोच्च आचार्य धर्मसत्ता के सम्राट ज्योतिष् एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज 2. अधार्मिक अवैदिक राजसत्ता के शासक प्रधानमंत्री राजीव गाँधी, गृहमंत्री बूटा सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एन डी तिवारी(पूरी केंद्र और राज्य की कांग्रेस सरकार) 3. तत्कालीन राज सत्ता और सनातन धर्म सत्ता दोनों का विरोधी अवैदिक अधार्मिक पंथ विश्व हिन्दू परिषद् जिसका राजनैतिक चेहरा भाजपा और मूल में आरएसएस है। 4. इलाहाबाद हाई कोर्ट किसने क्या किया आइये पढ़ते हैं?? जनवरी माघ मेला 1989 प्रयागराज में निर्मोही अखाड़े के कुछ प्रतिनिधि पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के यहाँ आये और निवेदन किया कि महाराज जी राम जन्मभूमि का विवाद अब अखाड़े से संभल नही रहा है। आप ज्योतिष् एवं द्वारकाशारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु हैं। अयोध्या आपके अधिकार क्षेत्र में आता है अतः कृपया आप हमारा सहयोग करें, और आप स्वयं इस विवाद को सुलझाने के लिए आगे आने का कष्ट करें। निर्मोही अखाड़े का निवेदन स्वीकार कर स्वयं मन्दिर के विवाद में परमपूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज हस्तक्षेप किये और संत सम्मेलन करके सन्तों को साथ लेकर इस विषय को सुलझाने का प्रयास करने की बात की। पूरे देश के सन्तों को 3 जून 1989 में चित्रकूट में बुलाकर भारी गर्मी में राम मंदिर के समाधान के प्रयास का श्रीगणेश किया। इस सम्मेलन में उन्होंने देश भर के लगभग सभी सम्प्रदायों के 1000 बड़े सन्तों को बुलाया, जिसमे शंकराचार्य के अतिरिक्त वैष्णवाचार्य भी थें। 108 शीर्ष धर्माचार्यों ने एक साथ भगवान रामलला के जन्मभूमि और मन्दिर के पुनरुद्धार के लिए शंखनाद किया इस सम्मेलन में देश भर से लाखों राम भक्त शिष्य सम्मिलित हुए। जिसमें आचार्यों के साथ हजारों सन्तों ने भी एकसाथ शंखनाद किया। चित्रकूट सम्मेलन के बाद देश भर में #श्रीराम_जन्मभूमि पुनरुद्धार के लिए सन्त सम्मेलन का शिलशिला तेजी से चल पड़ा। अक्टूबर 1989 में रामभक्तों, बुद्धजीवियों के साथ अयोध्या में श्री जन्मभूमि में रामलला के दर्शन करके वास्तु और मन्दिर स्थापत्य के साक्ष्य एकत्र किए। 19 अक्टूबर 1989 को, चित्रकूट सम्मेलन में तय बिना किसी निजी मांग के न्यायालय में श्रीराम जन्मभूमि का शास्त्र सम्मत एवं दृढ़ पक्ष रखने के लिए शंकराचार्य जी ने #अखिल_भारतीय_श्रीराम_जन्मभूमि_पुनरुद्धार_समिति गठित की क्योंकि निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान निजी हित वाली मांग के साथ कोर्ट में केस लड़ रहे थें। शंकराचार्य जी की यह संस्था तब से लेकर सुप्रीम कोर्ट का अन्तिम फैसला आने तक कोर्ट में मजबूती से केस लड़ती रही और 2010 के इलाहाबाद हाई कोर्ट और 2019 के सुप्रीम कोर्ट में यह सिद्ध किया कि विवादित भूमि ही भगवान् श्रीराम की मूल जन्मभूमि है। यह जो निर्णय हिन्दुओं के पक्ष में आया उसका प्रमुख कारण जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी एवं उनके शिष्य प्रतिनिधि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ही बने। इसबात को कोई भी कोर्ट के फैसलों को पढ़कर जान सकता है। कोर्ट ने अपने फैसले में शंकराचार्य और उनके शिष्य स्वामी जी को धार्मिक विशेषज्ञ घोषित किया है और इस फैसले में एक महत्वपूर्ण पक्षकार माना है तथा फैसला आने के लिए सहयोगी की भूमिका निभाने के कारण उनका नाम लेकर धन्यवाद भी ज्ञापित किया है। न्यायालय के फैसले की समीक्षा करके इस विषय पर हम फिर कभी लिखेंगे। 3 जून 1989 के चित्रकूट सम्मेलन के बाद शंकराचार्य जी ने देश के अनेक बड़े संतों को साथ लेकर समाज मे राम जी के लिए जनजागरण अभियान शुरू कर दिया। जिसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। मध्यप्रदेश के झोतेश्वर में एक बार 5 लाख से अधिक जनता पहुँची जो इनके व्यक्तित्व, इनके प्रभाव की विशालता को दर्शाती है। 1989 में ही राम मन्दिर के आंदोलन के समय शंकराचार्य जी ने काशी के पण्डितों से राम मन्दिर के शिलान्यास का शुभ मुहूर्त निकलवाया जो कि उत्तरायण में #7_मई_1989 तय हुआ। शंकराचार्य जी का सदैव से यह मानना था कि धर्म सम्बन्धीत विषयों का राजनीतिकरण नही होना चाहिए, अतः राजनीति से अलग सन्तों को लेकर शंकराचार्य जी ने राम मन्दिर के लिए समाज को जागरूक करना आरम्भ कर दिया पर धर्म के नाम पर राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले संगठनों को यह कहाँ मान्य था कि वो धर्म का राजनीतिकरण करके हिन्दूओं के भावनाओं के साथ खिलवाड़ न करे अतः उसे तो करना ही था। ◆इसी वर्ष यानी 1989 के दिसम्बर से लोकसभा का चुनाव होना था।◆ एक तरफ 2 सीटों वाली पार्टी भाजपा कुछ भी करके सत्ता प्राप्त करना चाहती थी तो वही राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार भी शाहबानो मामला, बोफोर्स घोटाला, पंजाब और जम्मू कश्मीर की अस्थिरता, श्रीलंका में सेना भेजने एवं वी पी सिंह जैसे बड़े नेता आदि के बगावत जैसे विषयों से काफी चिंतित और कमजोर अनुभव कर रही थी। उस समय विश्व हिन्दू परिषद अर्थात भाजपा के पास हिन्दुओं के वोट के लिए कोई ठोस मुद्दा नही दिख रहा था बीजेपी के पास दो सीटें थी, जब इन अधर्मी धूर्तों ने शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी के राम मन्दिर आंदोलन और शिलान्यास की घोषणा से प्रभावित हो रहे हिन्दू जनता को देखा तब इनलोगों को बहुत ही जल्दी यह समझ में आ गया था कि यह राम मन्दिर एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिससे वह सत्ता की सीढ़ियों तक आसानी से पहुँच सकतें हैं अतः ये मौका हाथ से न चला जाये और हिन्दू जनता, शंकराचार्य जी को राम मन्दिर का उद्धारक न मान ले उससे पहले ही क्यों न वही शिलान्यास का दिखावा कर दे जिससे इसी वर्ष दिसम्बर में केंद्र और राज्यों के चुनावों में सत्ता हाशिल की जा सके। अतः राम और कृष्ण आदि देवताओं को मनुष्य मानने वाले संघी भाजपाइयों ने शंकराचार्य जी के इस मुद्दे को लपक लिया और इसे 1989 के दिसम्बर में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए भुनाना शुरू कर दिया। इधर अयोध्या में राम मन्दिर के आन्दोलन की बात को देखते हुए कुछ पक्ष न्यायालय से गुहार लगा दिए जिससे अगस्त में ही इलाहाबाद हाई कोर्ट की स्पष्ट टिप्पड़ी आ गयी कि विवादित भूमि पर जो जैसा है उसे यथावत बनाये रखना है। #खेल_अब_शुरू_होता_है। दिसम्बर 1989 से 9वी लोकसभा के चुनाव का तारीख तय हो चुका था। राजीव गाँधी को पता था कि शंकराचार्य जी ने लोकसभा चुनाव के बाद अगले वर्ष 7 मई को अयोध्या में शिलान्यास की तिथि घोषित की हुई है और दूसरी ओर भाजपा विश्व हिन्दू परिषद् के बैनर तले राम मन्दिर के नाम से इसी वर्ष दिसम्बर से शुरू होने जा रहे चुनाव के पहले ही कुछ ऐसा करने वाली है जिससे चुनावों में वो हिन्दुओं का वोट काट कर कांग्रेस को भारी नुकसान पहुँचा सकती है। कुछ समय बाद विश्व हिन्दू परिषद् ने चुनाव से पहले राम मन्दिर में शिलान्यास करने की योजना बनाई और जनता को मूर्ख बनाने के लिए इस योजना में शिला पूजन और शिलायात्रा कार्यक्रम आरम्भ कर दी। विश्व हिंदू परिषद् द्वारा शिलापूजन के कार्यक्रम से सितंबर महीने से भागलपुर बिजनौर सहित कई जगह हिन्दू मुसलमान की छड़पे होनी शुरू हो गयी थी। इसे देखते हुए #13_अक्टूबर_1989 को, लोकसभा में गैर-भाजपा दलों द्वारा एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पास किया जिसमे कहा गया कि सरकार शिलान्यास की अनुमति नहीं दे और विहिप को “कार्यक्रम रद्द करने” के लिए कहे क्योंकि चुनाव का समय आ गया है और सारा सुरक्षा बल पुलिस आदि चुनाव में लगाए जाएंगे अतः ऐसे में यदि कोई हिन्दू मुस्लिम दंगा होता है तो संभालना मुश्किल हो जाएगा। इधर राजीव गाँधी को लोमड़ी वाली चालाकी सूझी। हो सकता है किसी मूर्ख सलाहकार ने ऐसा सलाह दिया हो। हुआ ये कि राजीव गाँधी ने सोचा कि हिन्दुओं को लुभाने के लिए वो विश्व हिन्दू परिषद् से साँठ गाँठ कर अयोध्या से चुनाव प्रचार की शुरूआत करेंगे और हिन्दुओं को मूर्ख बनाने के लिए रामराज्य के स्थापना आदि की भावनात्मक बातें कर देंगे जिससे जनता यह सोचेगी कि राजीव गाँधी ने ताला खुलवाया और रामजन्मभूमि के शिलान्यास करवाने की अनुमति दी तथा अयोध्या से चुनाव प्रचार की शुरुआत करके रामराज्य स्थापित करने का विश्वास दिला रहे हैं तो ऐसा कर ही देंगे। जिस तरह से आज रामराज्य का भरोसा देकर संघ भाजपा ने हिन्दुओं को मूर्ख बनाया हुआ हैं उसी प्रकार उस समय राजीव गाँधी भी हिन्दुओं को मूर्ख बनाने का सोचा। रही बात मुस्लिम वोटों की तो चूंकि मुस्लिम शाहबानों प्रकरण से खुश हैं ही और इस शिलान्यास से वो नाराज भी नही होंगे ऐसा इसलिए की राजीव गाँधी ने बूटा सिंह को भेजकर अशोक सिंघल से तय कर लिया कि आप चुनाव से पहले शिलान्यास कर लो हम सब संभाल लेंगे पर शिलान्यास मूल जन्मभूमि पर न करके गर्भगृह से 192 फुट दूर करेंगे जिससे विवादित भूमि पर कोई छेड़छाड़ भी न हो और हिन्दुओं को राम मन्दिर के शिलान्यास के नाम पर मूर्ख भी बनाया जा सके। इसी कारण से राजीव गाँधी और कांग्रेस सरकार ने संसद में अनेक गैरभाजपा पार्टियों के द्वारा शिलान्यास कार्यक्रम को रोकने के पारित प्रस्ताव को पूरी तरह से नजरअंदाज कर विश्व हिन्दू परिषद् के साथ साँठ गांठ करके समर्थन करने का फैसला लिया। राजीव गाँधी ने पूरे शिलान्यास प्रकरण के षड़यन्त्र को सफल बनाने की जिम्मेदारी तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह को दी। बूटा सिंह राजीव गाँधी और विश्व हिंदू परिषद् के मध्य बिचौलिए की भूमिका निभाने के नियुक्त किये गए। बूटा सिंह, जिनका 2 जनवरी 2021 को 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया, ने कांग्रेस में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पहचान बनाई जो इंदिरा या राजीव गांधी के लिए कुछ भी कर सकते थे। ये बूटा सिंह ही वो व्यक्ति था जिसने कांग्रेस के लिए "हाथ का पंजा" चुनाव चिन्ह का सुझाव दिया था। ये बूटा सिंह पहले कम्युनिस्ट थें बाद शिरोमणि अकालीदल से होते हुए 1960 में कांग्रेस में शामिल हो गए थें। इधर विश्व हिंदू परिषद् ने कांग्रेस के साथ मिलकर अयोध्या में राम मन्दिर के शिलान्यास करने की पूरी योजना बना ली। कांग्रेस और विश्व हिंदू परिषद् दोनों ने 5 अगस्त 2020 के शिलान्यास के तरह ही 1989 का शिलान्यास दक्षिणायन के अशुभ मुहूर्त में 9 नवम्बर को करवा दिया । विश्वहिन्दू परिषद् के सहयोग और समर्थन के लिए राजीव गांधी के आदेश पर गृहमंत्री बूटा सिंह कई अन्य लोगों को साथ लेकर अयोध्या पहुंच गए। इनमें मुस्लिमों के प्रतिनिधियों का समूह, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सब रजिस्ट्रार उत्तर प्रदेश राज्य के एडवोकेट जनरल, और अन्य कई लोग शामिल थे। उन्होंने स्थानीय राजस्व अधिकारियों से बात की और उन्हें समझा दिया कि शिलान्यास के लिए चयनित स्थल विवादित भूमि नही है। पत्रकार अजय सिंह बताते हैं कि 10 नवंबर 1989 को अयोध्या में विवादित राम मंदिर की शिलान्यास के एक दिन बाद, वो उत्तर प्रदेश के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक आर पी जोशी के आधिकारिक आवास में गए। उन्होंने जब जोशी जी से पूछा कि क्या किसी विवादित स्थल पर नींव रखी गई थी?" तब जोशी जी ने केवल एक शब्द "हाँ" बोला। फिर पूछा कि "क्या आप यह पहले से जानते थे कि साइट विवादित थी?" तब उन्होंने फिर से "हाँ" का उत्तर दिया और कहा "हम सभी इसे जानते हैं लेकिन यह सरकार का निर्णय था।" जोशी ने कुछ खुलासा करके बातचीत बंद कर दी, सिवाय इसके कि उनके पास दिल्ली और लखनऊ में अपने शीर्ष मालिकों के निर्देशों का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। बता दें कि बूटा सिंह शिलान्यास से पहले फैजाबाद-अयोध्या का दौरा करने वाले एकमात्र गैर-संघ परिवार के नेता नहीं थे। राजीव गांधी ने अपनी पार्टी के चुनाव अभियान की शुरुआत अयोध्या से की और कमलापति त्रिपाठी, सी. राजेश्वर राव, वी.पी. सिंह और सैयद शहाबुद्दीन उन लोगों में शामिल थे जो बाबरी मस्जिद को खतरा नहीं होने की सूचना मिलने के बाद वापस लौटे। राजीव गाँधी बूटा सिंह आदि ने सोचा कि एक तरफ हिन्दुओं को राम मन्दिर के शिलान्यास के नाम से खुश कर लेंगे और दूसरी ओर विवादित भूमि (गर्भ गृह) न होने के कारण मुसलमानो को नाराज होने से रोक लेंगे। पर हुआ यह कि उनके इस घटना से मुसलमान कांग्रेस से नाराज हो गया और कांग्रेस को वोट नही दिया परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस 1989 लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार गयी और इस प्रकार राजीव गाँधी की सारी चालाकी मूर्खता में बदल गयी। एक प्रकार से शंकराचार्य जी को धोखा देने का परिणाम मिल गया। इस नकली शिलान्यास का लाभ भाजपा को मिल गया और भारत की जनता भाजपा के छल को समझती उससे पहले चुनाव आ गया और भाजपा को राम मन्दिर का शिलान्यास कराने वाला सोच कर वोट दे दिया जिससे लोकसभा में भाजपा सीधे 2 सीट से 85 सीट पे आ गयी। शिलान्यास के समय विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या में सिंह द्वारा के पास एक बहुत बड़ा गड्ढा खना जिसमे लाखो लोगो ने उस दिन राम के नाम पर रुपया पैसा सोना चाँदी आभूषण आदि उस गड्ढे में डाले क्योंकि लोगो से संघीयो यानी विश्व हिन्दू परिषद वालो ने राम मन्दिर के नाम पर उस गड्ढे में डलवाया। सोने चांदी से पटा वो गड्ढे का धन कहा गया ये बात आजतक आम जनता को नही पता है। एक कमरे के बराबर वाले उस गड्ढे का चित्र संलग्न। जब जगद्गुरु शंकराचार्य सहित वैदिक विद्वानो ने शास्त्र के आधार पर इस नकली शिलान्यास को उजागर कर दिया तो भाजपायी संघी चिढ़ गए और तब से स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज को कांग्रेसी कहना आरम्भ कर अपने कार्यकर्ताओं से गाली दिलवाना शुरू कर दिया जो आजतक चला आ रहा है। रामालय न्यास बनाने की बात तो 1993 में श्रृंगेरी चतुष्पीठ सम्मेलन से आयी थी जबकि मस्जिद के बगल में मन्दिर बनाने का षड़यंत्र 1989 में ही शुरू हो गया था जिसका भंडाफोड़ स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज ने किया था अतः आज जो लोग रामालय न्यास द्वारा मन्दिर के साथ मस्जिद बनाने की झूठ फैला रहे हैं वो यह जान लें कि 1989 में कांग्रेस भाजपा के इसी षड़यन्त्र को जिसने उजागर किया हो और जो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रमुख पक्षकार बनकर इसी बात पर लड़ते रहें कि बाबरी नाम का कभी कोई मस्जिद था ही नही अतः बिना शर्त पूरी भूमि हिन्दुओं को दे दी जाए वो क्या 25 शीर्ष शांकर वैष्णव संप्रदायाचार्यों को लेकर रामालय न्यास से मन्दिर और मस्जिद बनायेंगे? और क्या सारे शीर्ष संप्रदायाचार्य भी अयोध्या में मन्दिर के साथ मस्जिद बनाएंगे? माने झूठ की भी कोई सीमा होती है। शंकराचार्य जी ने उस समय कांग्रेस और विश्व हिंदू परिषद् के सम्मिलित षड़यंत्र का भंडाफोड़ कर दिया था पर धर्म विरुद्ध कार्य का समर्थन नही किया। 1989 में हुए चुनाव के केन्द्र में वी पी सिंह की जनता दल की सरकार भाजपा के बाहर से समर्थन से बनी और उत्तर प्रदेश राज्य में वी पी सिंह के पार्टी जनता दल से मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बन गया था। ध्यान देने वाली बात यह है कि इसी सरकार के समय में कश्मीरी पण्डितो को कश्मीर में मारा गया तब इसी भाजपा की सरकार केंद्र में थी और मुफ़्ती मोहम्मद सईद इनका गृहमंत्री था। इधर संतों का जो पूर्व निर्धारित कार्यक्रम था जिसका चुनाव से कोई संबंध नहीं था, उसे तो होना ही था संतों ने यह तय किया था कि जगद्गुरु के नेतृत्व में उत्तरायण के शुभ मुहूर्त में 7 मई 1990 को अयोध्या में राम मन्दिर का शिलान्यास करेंगे तो करेंगे। तब तक तो केंद्र में वी पी सिंह की और राज्य में मुलायम सिंह की सरकार बन ही चुकी थी। 30 अप्रैल 1990 को, पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार शंकराचार्य जी द्वारिका से दिल्ली होते हुए राम जन्मभूमि का शिलान्यास करने के लिए निकल पड़े, वाराणसी होते हुए जैसे ही वो आजमगढ़ पहुँचे उसी समय रात को ही मुलायम सिंह की सरकार ने उनको गिरफ्तार करवा लिया और यह गिरफ्तारी बीजेपी के दबाव में आकर के मुलायम सिंह से वी पी सिंह ने करवाया था क्योंकि बीजेपी के समर्थन से ही केन्द्र में जनतादल की सरकार चल रही थी और बीजेपी ने धमकी दिया था कि यदि उनको गिरफ्तार नहीं करोगे तो हम तुम्हारी सरकार गिरा देंगे और इस धमकी के डर के कारण जनता दल के नेता वी पी सिंह ने अपने नेता मुलायम सिंह को कहा कि उनको अरेस्ट किया जाए। बिना किसी आरोप के, बिना किसी गलती के झूठे आरोप में उत्तर प्रदेश पुलिस ने जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज को रात को आजमगढ़ में गिरफ्तार कर लिया और रात भर मिर्जापुर के जंगलों में घुमाती रही, उन्हें उनका दैनिक पूजा संध्या भी नही करने दिया और अंत में रातभर जंगल मे घुमाने के पश्चात सुबह चुनार के किले में ले जाकर बंद कर दिया। वहाँ पर पहले जो थे उन्हें बता दिया गया था कि कश्मीर से एक खूंखार आतंकवादी लाया जा रहा है जो चुनार के किले में बंद किया जाएगा जिससे वहां की सामान्य पब्लिक बहुत डर गई थी वहां की सिक्योरिटी बहुत ज्यादा चौकन्ना हो गई थी पर जब सुबह सबको पता चला कि यह कोई खूंखार आतंकवादी नहीं बल्कि पूज्यपाद जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज हैं तो सबके होश उड़ गए। यह खबर लीक हुई अगले दिन आग की तरह देश भर में फैल गयी, लोगों के होश उड़ गए चारों तरफ साधु संत विभिन्न धार्मिक संगठन आम नागरिक आंदोलन करने लग गए। गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार बंगाल, इस प्रकार से सम्पूर्ण भारत में ही आंदोलन प्रदर्शन शुरू हो गए। लोगों ने केंद्र सरकार से कहा कि यदि आप उनको नहीं छोड़ेंगे तो हम बहुत जल्द हिंसक आंदोलन शुरू कर देंगे और इसकी सारी जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार की होगी। 8 मई 1990 को अन्त में जनता के दबाव के कारण 9 दिन चुनार जेल में रखने के बाद सरकार ने माफी मांगते हुए बिना शर्त शंकराचार्य जी को ससम्मान मुक्त किया। उसी वर्ष 1990 में शंकराचार्य जी ने पूरे भारत मे दशरथ कौशल्या यात्रा निकाली जिसका हिन्दू समाज के जागरण में बहुत बड़ा योगदान साबित हुआ। इस अभियान में देश भर में लाखों लोगो के हस्ताक्षर लिए गए। 2 नवम्बर 1990 में संघियों ने भोलेभाले हजारो हिन्दुओ को कारसेवा के नाम पर मरवा दिया। वो बात सबको पता है जिसकी सहानुभूति ले लेकर ये आज सत्ता में बैठे हैं। नोट:- 1. शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के द्वारा राम मन्दिर के लिए किये गए आगे के कार्यों को पढ़ने के लिए इसके पहले के पोस्ट पढ़ें। 2. यह लेख अनेक पुस्तकों, समाचार पत्रों आदि के आधार पर लिखी गयी है। कुछ प्रमाण कमेन्ट में पढ़ सकते हैं। 3. यह पोस्ट मुझ लेखक के नाम सहित कॉपी कर सकते हैं। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज की जय हर हर महादेव जय जय श्री सीताराम ✍️ दीपक कुमार केशरी #सनातनी

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