क्या आपको वर्तमान पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्यों से प्रश्न करने का अधिकार है?

★★क्या आपको वर्तमान पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्यों से प्रश्न करने का अधिकार है?★★ ★★शंकराचार्य के प्रति जनता और राजा का कर्तव्य क्या है?★★ ★★क्या आप आद्यजगद्गुरु शंकराचार्य जी द्वारा आपके लिए कहे गए इन आदेशों का पालन करते हैं?★★ ★★आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य और भारत के तत्कालीन चक्रवर्ती सम्राट महाराज सुधन्वा ने भारत की जनता और शासन तन्त्र को क्या आदेश दिया है?★★ आज भारत मे ये देखा जा रहा है कि वर्तमान राजसत्ता के बचाव में सत्ता समर्थक चंद लोग हर उन विषयों के लिए भी हम सनातन धर्मियों के सर्वोच्च गुरु पूज्य शंकराचार्यों को जिम्मेदार ठहरा देतें हैं जिन विषयों की जिम्मेदारी समाज से आयकर लेने वाले भारत के राजसत्ता की ही होती है। ये ऐसा इसलिए करते हैं जिससे भारत की आम भोली भाली जनता, भारत के नागरिकों की मूलभूत समस्याओं के लिए इन राजनैतिक पार्टियों के पाखंडी नेताओं को दोषी न ठहरा सके और भ्रमवश अपने गुरूओं को ही दोषी मान बैठे अतः इस प्रकार धर्म के नाम पर सत्ता सुख भोगने वाले राजनैतिक दल, नेता आदि की वोट बैंक बची रहे। और प्रचार तन्त्र के बल पर यह ऐसा करने में सफल भी होते दिखाई देते हैं। आपने प्रायः कुछ क्षद्म धार्मिक लोगों को शंकराचार्यों पर आरोप लगाते और प्रश्न करते देखा होगा पर क्या आप जानते हैं कि 2500 वर्ष पूर्व आद्यजगद्गुरु शंकराचार्य जी ने भारत मे सभी अवैदिक मतों को शास्त्रार्थ में हराकर भारत में सनातनधर्म की पुनर्प्रतिष्ठा करके और भविष्य में भी सनातन धर्म कि रक्षा के लिए भारत की चार दिशाओं में चार आम्नाय शांकर पीठों की स्थापना करके उसपे अपने ही स्वरूप चार आचार्यों को प्रतिष्ठा करके हम सनातन धर्मियों को कुछ आदेश दिया था। क्या आपको वो आदेश याद हैं? क्या आप उन आदेशों का पालन करते हैं कि बस पूज्य शंकराचार्यों को ही हर बात के लिए जिम्मेदार मानते हैं? आप अपनी जिम्मेदारी कब निभायेंगे? यदि अपनी जिम्मेदारी नही निभा रहे हैं तो आपको कोई अधिकार नही है कि आप किसी पूज्य शंकराचार्य जी के कार्यों पर प्रश्न उठाये अथवा आरोप लगाए। आइये पहले जानते कि शंकराचार्य जी ने हम सनातनधर्मी जनता को क्या आदेश दिया है फिर जानेंगे कि भारत के चक्रवर्ती सम्राट हमारे महाराज सुधन्वा ने हम नागरिकों को क्या आदेश दिया है? श्रीमदाद्यजगद्गुरु शंकराचार्य ने स्वयं द्वारा रचित "मठाम्नाय महानुशासनम्" ग्रन्थ के द्वारा हम सबको कहा है कि- 1. विरुद्धाचरणप्राप्तावाचार्याणां समाज्ञया । लोकान् संशीलयन्त्वेव स्वधर्माप्रतिरोधतः ॥ 2. सुधन्वा हिमहाराजस्तथान्ये च नरेश्वराः । धर्मपारम्परीमेतां पालयन्तु निरन्तरम् ॥ आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य ने देश के शासकों को आदेश दिया है कि जब (लोगों में धर्म के) विरुद्ध आचरण की प्रवृत्ति बढे़ ( तो तत्सम्बन्धित देश के राजाओं को चाहिये कि वह अपने मठके) आचार्यों की आज्ञा लेकर अपनी प्रजाओं के आचरण की परीक्षा अपने धर्म में बाधा न डालते हुए करें। सम्राट सुधन्वा एवं (आगे आने वाले ) अन्य सभी नरेश धर्म की इस परम्परा का निरन्तर पालन करें। ★अब आप स्वयं विचार करिये कि आज भारत का शासन तन्त्र जो स्वयं सबसे बड़ा अधर्मी है जो गौहत्यारा हो, जो स्वयं अनेक नकली शंकराचार्य बनाता हो जो अपने कार्यकर्ताओं से हमारे पूज्य शंकराचार्यों का अपमान करवाता हो, जो सनातन धर्म विरोधी, वर्णाश्रम विरोधी, ब्राह्मण विरोधी, गौ विरोधी, मन्दिर-मूर्ति विरोधी लोगों को महापुरुष मानकर देश मे प्रचार करवाता हो, जिससे शंकराचार्य जी का शास्त्रार्थ हुआ ऐसे नास्तिक बौद्धादियों का देश विदेश में महिमामंडन करता हो, जो मन्दिरों को तोड़वाता हो, जो मन्दिरों की सम्पत्ति को लूटकर सरकारी तन्त्र के माध्यम से विधर्मियों में वितरित करता हो वो भला क्या पूज्य शंकराचार्य का आदेश लेकर जनता के धर्म की परीक्षा ले सकेगा?? जो शासक स्वयं आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य का आदेश नही मानता उसे या उसके कार्यकर्ताओं को क्या अधिकार है कि वे वर्तमान के पूज्य शंकराचार्यों से उनके जिम्मेदारी या उनके कार्यों पर प्रश्न खड़ा करें ?? आगे आद्य जगद्गुरुदेव कहते हैं- 3. कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायामृषिसत्तम: । द्वापरे व्यास एव स्यात् कलावत्र भवाम्यहम् ।। 4. अस्मत्पीठसमारुढ: परिव्राडुक्तलक्षण: । अहमेवेति विज्ञेयो 'यस्य देव' इतिश्रुते: ।। ●आद्य शंकराचार्य जी ने ललकार कर यह घोषणा की कि सतयुग में ब्रह्मा, त्रेता में मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ, द्वापर मे वेदव्यास तथा कलयुग मे मैं (शंकराचार्य) जगद्गुरु हूँ। और ●मेरे द्वारा बताए गए लक्षणों से सम्पन्न सन्यासी मेरे पीठ पर आसीन हो तो उसे मैं (शङ्कर) ही हूँ (इस प्रकार मेरा ही स्वरूप )समझना चाहिए, क्योंकि इस सम्बन्ध में यस्य देव श्रुति प्रमाण है। ◆यस्य देवे पराभक्तिर्यथादेवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।। (श्वेताश्वतरोपनिषद् अ. ६/२३) ◆गुरौ मनुष्यबुद्धिं च मंत्रेश्वक्षरबुद्धिकम् । प्रतिमासु शिलाबुद्धिं कुर्वाणो नरकं व्रजेत ।। अर्थात गुरु को मरणधर्मा सामान्य मनुष्य समझने वाला, मन्त्रों में वर्णमाला के सामान्य अक्षरों के भाव रखने वाला तथा भगवान की प्रतिमा को केवल पत्थर की दृष्टि से देखने वाला व्यक्ति नरकगामी होता है। ★कलयुग में शंकराचार्य ही जगद्गुरु हैं पर शंकराचार्य को मानने के बजाय आज भारतीय शासनतन्त्र एवं राजनैतिक पार्टियों ने अनेकों कालनेमी नकली शंकराचार्यों की फौज खड़ा कर दी है ऐसे धूर्तों को असली मान्य पूज्य शंकराचार्यों पर प्रश्न करने का क्या अधिकार है? वही आज अनेकों सम्प्रदाय के अनेकों नकली जगद्गुरु पैदा हो गए हैं जो स्वयं को घूम घूम कर जगद्गुरु सिद्ध करते हैं इनमें से अनेक तो ऐसे हैं जो नाना प्रकार के आपराधिक कृत्यों में लिप्त है और इन्हें राजनैतिक पार्टियों का समर्थन प्राप्त है और ये उन पार्टियों के कार्यकार्याओं के जैसे जनता से वोट मांगते हैं। अब आप बताइए कि क्या भारत की सरकारें या राजनैतिक पार्टियाँ या आरएसएस भाजपा जैसे क्षद्महिन्दुवादी संगठन जो जनता को हिंदुत्व के नाम पर बरगलाती हैं, अपने कार्यकर्ताओं से पूज्य शंकराचार्यों का अपमान करवाती हैं वो क्या मान्य शंकराचार्यों को जगद्गुरु मानती हैं? जिनके लिए, शास्त्र को धर्म के लिए प्रमाण न मानने वाले, राम और कृष्ण को देवता न मानने वाले गोलवरकर परम पूज्य हो जिनके लिए वो गुरु हो और शिव स्वरूप हम सनातनियों के पूज्य शंकराचार्य निंदनीय हों उन क्षद्महिन्दुवादी संगठनों को अथवा उनके कार्यकर्ताओं को किसी शंकराचार्य पर धर्म के क्षति को लेकर प्रश्न उठाने का क्या अधिकार है? 5. चातुर्वर्ण्यं यथायोग्यं वाङ्मनः कायकर्मभिः । गुरोः पीठं समर्चेत विभागानुक्रमेण वै ॥ चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र) की जनता को चाहिए कि मनसा, वाचा, कर्मणा, अपने-अपने सम्बन्धित गुरुपीठ की पूजा करें। ★ आज की स्थिति देख लीजिए जनता अपना कर्तव्य भूल गयी आचार्यों की बात माननी नही है बस आचार्यों पर दोषारोपण करना है। आज ब्राह्मणों की और क्षत्रियों की स्थिति बहुत दयनीय है। देश मे अनेक ब्राह्मण एकता के नाम पर संगठन बन गया है पर फिर भी न तो ब्राह्मण एकजुट है और न ही उसके भीतर ब्राह्मणत्व ही बच पा रहा है। यही स्थिति क्षत्रियों की भी है आज यदि भारत के सभी क्षत्रिय एकजुट हो जाये तो संसार की ऐसी कोई शक्ति नही है जो उन्हें पुनः उनकी राजसत्ता प्राप्त करने से रोक सके। पर आजकल तो ब्राह्मण क्षत्रिय ही आपस मे राजनैतिक स्वार्थ के कारण लड़ने लगे हैं। ऐसा नही है कि आम जनता शंकराचार्यों को नही मानती पर यह भी बात सच है कि जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग भ्रमित होकर राजनैतिक पार्टियों, नकली बाबाओं, नकली जगदगुरुओं से ठगी जा रही है और स्वयं को स्वयं के लौकिक पारलौकिक कल्याण से दूर कर दे रही है। 6. धरामालम्ब्य राजानः प्रजाभ्यः करभागिनः । कृताधिकारा आचार्या धर्मतस्तद्वदेव हि ॥ आगे आद्य जगद्गुरुदेव भगवान् ने आदेश किया है जिस प्रकार अधिकार सम्पन्न राजा अपनी प्रजा से कर लेने के अधिकारी हैं उसी प्रकार अधिकार प्राप्त किए हुए पीठाधीश्वर (शंकराचार्य) भी धर्मानुसार कर ग्रहण करने के अधिकारी हैं। ★अब आप देखिए कि शंकराचार्य ने जो सिद्धान्त बनाया उसे भारत के सम्राट सुधन्वा ने भी मानने का आदेश दिया है पर क्या आज प्रजातन्त्र में प्रजा पूज्य शंकराचार्य को धार्मिक कर देती है? भारत की डेमोक्रेटिक सरकार (फर्जी लोकतान्त्रिक सरकार) जो धार्मिक न होकर घोर धर्म विरोधी है, लुटेरी है चोर है, जनता का तरह तरह से शोषण करती है उसे तो जनता खूब कर देती है। लुटेरे, हत्यारे, धर्मद्रोही राजनेताओं की पूजा करना आजके जनता का स्वभाव हो गया है पर यदि शंकराचार्य अपने निजी शिष्यों से भी दान लेकर अपना कार्य करें तो इन राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ता उनके ऊपर तरह तरह के आरोप लगाने लगते हैं। फिर ऐसे समाज संगठन, पार्टी या उनके कार्यकर्ताओं को क्या अधिकार है कि वो समाज मे हो रहे किसी भी प्रकार के विनाश के लिए शंकराचार्यों को दोषी ठहराए? जो (व्यक्ति/समाज/राष्ट्र) किसी पूज्य शंकराचार्य को धर्मकार्य के लिए एक रुपये दान नही करता जो किसी शंकराचार्य के अनुसार अपना जीवन नही चलाता जो अनेक प्रकार के धूर्त पाखंडी गुरुओं के चक्कर मे पड़ा रहता है उसे बिल्कुल भी उसके जीवन मे या समाज मे हो रहे किसी समस्या के लिए किसी मान्यपीठ के पूज्य शंकराचार्य को दोषी ठहराने या उनको जिम्मेदार कहने का अधिकार नही है। 7. धर्मो मूलं मनुष्याणां स चाचार्यावलम्बनः। तस्मादाचार्यसुमणेः शासनं सर्वतोऽधिकम् ॥ 8. तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शासनं सर्वसम्मतम् । आचार्यस्य विशेषेण ह्यौदार्यभरभागिनः ॥ ●आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी कहते है कि मनुष्य का जो मूल धर्म है वह आचार्य पर निर्भर है (क्योंकि सामान्य मनुष्यों को धर्म के तत्वों का ज्ञान नहीं होता, आचार्य अपने उपदेशों से लोगों को कर्तव्य कर्म के प्रवृत्ति और अकर्तव्य से निवृत्ति की शिक्षा देते हैं) इसलिए आचार्यरूपी अनमोल मणि का शासन सर्वोपरि है। ●अतः सर्वतोभावेन उदारतासम्पन्न आचार्य का शासन विशेष रूप से सभी (व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, सरकार) को मानना चाहिए। ★अब आप निष्पक्ष लोग बताइये कि क्या आप शंकराचार्य का धार्मिक आदेश मानते हैं? जबकि भारत की परम्परा में तो राजा को भी शंकराचार्य का आदेश मानना पड़ता था और आज ये दुष्ट शासन तन्त्र अनेक नकली शंकराचार्य बनाकर घुमा रही है और धर्म के क्षेत्र पर कब्जा जमा रही है मन्दिरों के धन को लूट रही है। फिर इन क्षद्महिन्दूवादी पार्टी के अनुयाइयों को शंकराचार्य से प्रश्न करने का क्या अधिकार है? ये इसलिए प्रश्न करते है क्योंकि ये भोली भाली जनता को मूर्ख बनाकर आचार्य परम्परा और सनातन धर्म को नष्ट कर देना चाहते हैं। ध्यान रहे जितने भी लोग शंकराचार्य का शासन मानते हैं उनका लोक परलोक में कल्याण कोई नही रोक सकता क्योंकि शंकराचार्य साक्षात महादेव के स्वरूप ही हैं। बाकी सबके लिए यमराज अलग से कढ़ाई में तेल खौलाते हुए प्रतीक्षा कर रहे हैं। 9. आचार्याक्षिप्तदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ 10. इत्येवं मनुरप्याह गौतमोऽपि विशेषतः । विशिष्टशिष्टाचारोऽपि मूलादेव प्रसिद्ध्यति ॥ 11. तानाचार्योपदेशांश्च राजदण्डांश्च पालयेत् । तस्मादाचार्यराजानावनवद्यौ न निन्दयेत् ॥ आगे आद्य शंकराचार्य जी कहते हैं - ●मनुष्य पापकर्मों को करके आचार्य द्वारा निर्धारित दण्ड (प्रायश्चित) भोगकर शुद्ध हो जाते हैं तथा पुण्यात्माओं की भाँति स्वर्ग जाते हैं। ●इसी प्रकार मनु ने तथा विशेषकर गौतम ने भी(गुरु की) गरिमा बतलाई है तथा (कहा है कि) मूल वेद से ही विशेष प्रकार के शिष्टाचारों की सिद्धि होती है। ●आचार्य के उन उपदेशों तथा राजा के द्वारा दिए गए दंड को लोगों को स्वीकार करना चाहिए अतः आचार्य और राजा दोनों ही शुद्ध और पवित्र हैं उनकी निंदा कभी नहीं करनी चाहिए। ★आप स्वयं देखिए कि सनातन धर्म मे यहाँ तक व्यवस्था है कि यदि किसी से कोई पापकर्म हुआ है तो आचार्य के द्वारा बताए प्रायश्चित को स्वीकार करने से वो पापमुक्त हो जाता है और नर्क में यमराज की कढ़ाई में तले जाने से बच जाता है और नर्क के बजाय स्वर्ग चला जाता है अर्थात यमराज के ऊपर भी आचार्य का शासन चलता है। वही आज भारत में वैदिक रीति से अभिषिक्त राजा का राजतन्त्र तो है नही उनके जगह पर अवैदिक अधर्मी लोगों का डेमोक्रेटिक शासन भारत देश पर चल रहा है जो एक प्रकार से लूट तन्त्र है। आज देखा जाय तो नारायण से चली आ रही इस वैदिक धर्म सत्ता जगद्गुरु शंकराचार्य एवं इनकी परम्परा तथा वैदिक राजसत्ता की परम्परा का सबसे ज्यादा विरोध ये आजकल वर्णाश्रम विरोधी, धर्मशास्त्र विरोधी, अधार्मिक अवैदिक डेमोक्रेटिक शासनतन्त्र का समर्थन करने वाले आर्यसमाजी, संघी आदि सङ्गठन एवं इनके कार्यकर्ता ही करते हैं। ये कभी नही चाहते कि भारत मे धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता आदि सबकुछ वैदिक परंपरा से चले इसलिए शंकराचार्य परम्परा को खत्म करके स्वयं को धर्म के ठेकेदार सिद्ध करना चाहते हैं राजतंत्र कभी वापस नही आने देना चाहते और पूंजीवाद को बढ़ाकर अर्थसत्ता पे चंदलोगों के माध्यम से काबिज हो जाना चाहते हैं जिससे समाज धार्मिक सामाजिक आर्थिक आदि हर प्रकार से इनका गुलाम हो जाये और धीरे धीरे यह होता हुआ दिखाई भी दे रहा है। अतः ऐसे गुरुद्रोही, गौद्रोही, धर्मद्रोही, राष्ट्रद्रोही संगठन पार्टी एवं उनके कार्यकर्ताओं को पूज्य शंकराचार्यों से सवाल करने या उनपर आरोप लगाने का क्या अधिकार है? 12. धर्मस्य पद्धतिर्ह्येषा जगतः स्थितिहेत्वे । सर्ववर्णाश्रमाणां हि यथाशास्त्रं विधीयते ॥६३॥ संसार की रक्षा के कारण धर्म का यह मार्ग सभी वर्णो तथा आश्रमों के लोगों के लिए शास्त्र की मर्यादा के अनुसार निर्धारित किया गया है। ★अब जब आचार्य द्वारा निर्धारित धर्म मार्ग पर जनता स्वयं नही चलेगी तो ऐसे जनता की रक्षा क्या संभव है? आचार्यों के बताए मार्ग पे न चलकर उनका और उनके मार्ग की निंदा, अपमान करने वाले अधर्मी किस मुख से धर्म और राष्ट्र की बात करते हैं? और जनता का एक वर्ग क्यों इन दुष्ट अधर्मी नेताओं को सर पर बैठाती है? अतः जनता के इस स्वार्थी वर्ग को भी अपने किसी व्यक्तिगत, सामाजिक आदि समस्या के लिए पूज्य शंकराचार्य और उनकी परम्परा को जिम्मेदार कहने का अधिकार नही है। ★★अब आइये देखते हैं कि हम सब के राजा जिन्हें सोमवंश चूड़ामणि चक्रवर्ती सम्राट महाराज युधिष्ठिर की परम्परा से भारत की राजसत्ता प्राप्त थी ऐसे चक्रवर्ती सम्राट महाराज सुधन्वा भारत के सभी वर्णों सहित समस्त नागरिकों को सदैव के लिए मान्य आदेश रूपी ताम्रपत्र शासनादेश के रूप में क्या विज्ञप्ति देते हैं। महाराज कहते हैं- सर्वे वयं तत्तन्मण्डलस्थाब्रह्मक्षत्रादयस्तत्तन्मण्डलस्यैवाचार्यस्यखधिकाराधिकृता वर्तिष्यामहे च। महाद्विनिर्णयप्रसक्तौ तु सुरेश्वराचार्य्या ऐवोक्तलक्षणतः सर्वत्रैव व्यवस्थापका भवन्तु भगवतामनुशासनाच्च। अस्मद्राजसत्तेव निरङ्कुशगुरुसत्ताप्युक्तमर्यादया जगत्यविचलं विचलतु। परिव्राजको हि महाकुलीनत्त्ववैदुष्यादिविशिष्टाचार्यलक्षणैरन्वित एव श्रीभगवत्पादपीठानामधिकारमर्हति न तु विनिमयेनेत्येवमादिनियमबन्धे भगवदाज्ञासमवबुद्धस्समस्तैरथास्मदादिब्रह्मक्षत्रादिवंशोद्भवैः परमप्रेम्णोत्तमाङ्गेनाद्रियत इत्येतां विज्ञप्तिमङ्गीकुर्वन्तु भगवन्त इति स्वस्त्यस्तु लोकेभ्यः। युधिष्ठिरशके २६६३ अश्विनशुक्ल १५। हम सभी उन मण्डलस्थ (अर्थात जिस शांकरपीठ के धार्मिक क्षेत्र में आते हो) ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि उन मंडलों के अधिकारी आचार्यों (अपने पीठ के शंकराचार्यों) की आज्ञा का पालन करते हुए व्यवहार करें। महत्वपूर्ण निर्णय की स्थिति में उपर्युक्त लक्षणों से युक्त द्वारका पीठाधीश्वर सुरेश्वराचार्य सर्वत्र व्यवस्थापक हो यह भगवत्पाद का अनुशासन है। हमारी राजसत्ता के समान निरंकुश गुरुसत्ता मर्यादानुसार संसार में अविचल रूप से अच्छी तरह चले। महाकुलीन, वैदुष्यादि विशिष्ट आचार्य गुणों से युक्त परिव्राजक ही श्रीभगवत्पाद की पीठों में अधिकार रखता है। किसी प्रकार के विनिमय से नही। भगवत्पाद के आज्ञानुसार नियमों में बँधे हुए हम सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वंशो में उत्पन्न हुए लोग परमप्रेम से इस आज्ञा को स्वीकार करते हैं। इस विज्ञप्ति को भगवन् स्वीकार करें। विश्व का कल्याण हो। युधिष्ठिर शक 2663 आश्विन शुक्ल 15। #सम्राट_सुधन्वा ★अब देखिए महाराज सुधन्वा ने आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व जिसकी तिथि भी लिखी है, आदेश दिया हुआ है कि सभी नागरिकों को, चाहे जिस भी वर्ण-जाति में उत्पन्न हुआ हो, पूज्य शंकराचार्यो की आज्ञा का पालन करना ही होगा। यहाँ तक आद्य शंकराचार्य के आदेश के अनुसार द्वारकाशारदा पीठ के शंकराचार्य ही किसी भी विवाद के तब से निर्णायक होते आ रहे हैं जब से चारो पीठ स्थापित हुए पर आजकल के धूर्त सरकारें वर्तमान पूज्यपाद द्वारकाशारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज का ही सबसे ज्यादा अपमान करने का असफल कुचेष्टा करते हैं जिसका पाप आज भारत की जनता को लग रहा है क्योंकि डेमोक्रेसी में जनता ही राजा होती है और इनको अपना प्रतिनिधि के रूप मे राजसत्ता सौप देती है। आगे भारत के सम्राट महाराज सुधन्वा कहते हैं कि शंकराचार्य परम्परा सदैव चलती रहे और आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य के द्वारा कहे गए लक्षणों से युक्त आचार्य ही चारो पीठों पर स्थापित होता रहे पर आज की सच्चाई यह है कि विश्व सहित भारत की समस्त आसुरी शक्तियाँ शंकराचार्य एवं उनके परम्परा को नष्ट कर देना चाहती हैं। इसलिए ये लोग हिंदुत्व के नाम पर राजनैतिक पार्टी, क्षद्म धार्मिक संगठन बनाकर, धन बल छल से भारत की राजसत्ता पर काबिज होकर धर्मक्षेत्र में अनैतिक हस्तक्षेप करती हैं, नकली अनेक शंकराचार्य पीठें एवं शंकराचार्य बनाती हैं इसके अतिरिक्त जो असली पीठें (ज्योतिष्पीठ आदि) भी हैं उनपे भी अपने कार्यकर्ताओं (वासुदेवानंद आदि) से कब्जा करवाना चाहती हैं। और यदि इनका विरोध किया जाए तो आज आधुनिक संचार माध्यमों से आई टी सेल आदि बनाकर अपने खरीदे गए कार्यकर्ताओं से अपमान करवाने का असफल प्रयास भी करती हैं। आगे महाराज ने बताया कि हम सभी के पूर्वजों ने यह संकल्प लिया था कि वो आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य के बनाये सिद्धान्तों को सदैव के लिए स्वीकार करेंगे पर क्या आज हम सभी अपने पूर्वजों के वचनों, संकल्पों को निभाते हैं? शायद नही। यदि निभाते होते तो आज भारत की सनातन धर्म की यह स्थिति नही होती। जनता के लिए जीविका, स्वास्थ्य, सुरक्षा, न्याय, सम्मान की व्यवस्था करने का दायित्व उन सत्ताधारियों का है जो जनता से आयकर(टैक्स) लेती हैं जो जनता को दण्ड देती हैं चूंकि शंकराचार्य किसी प्रकार का कर नही लेते और शंकराचार्यों का दण्ड जनता के ऊपर लागू (यमलोक में लागू होता है) नही होता इसलिए हमारा मानना है कि किसी को अपने किसी धार्मिक सामाजिक समस्या के लिए शंकराचार्य को दोषी ठहराने का अधिकार नही है। शंकराचार्य आपके लिए धर्म का उपदेश कर रहे हैं यही आपके ऊपर बहुत बड़ी कृपा कर दे रहे हैं। अपने सर्वोच्च आचार्य, गुरु का सम्मान न करने वाले लोगों का विनाश होता ही है और होता रहेगा जबतक जनता इन आचार्यों से छमा मांगकर इनके आदेशों का पालन करते हुए धर्म मार्ग पर न चले और अपने जन प्रतिनिधियों को भी आचार्य की आज्ञा मानने पर विवश न करे तब इस राष्ट्र सहित समूचे विश्व का, विश्व के नागरिकों का कल्याण नही हो सकता। अस्तु नोट:- यह लेख मुझे टैग करके मेरे नाम सहित कॉपी करले ऐसा करने से लोग मुझसे जुड़ेंगे और सत्य को जान पायेंगे। जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान् की जय ✍️दीपक कुमार केशरी #सनातनी

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