सनातन वैदिक हिन्दूधर्म मे वर्तमान शंकराचार्य तथा इनकी परम्परा का क्या महत्व है?

★★शंकराचार्य और उनके सिद्धान्तों ने कैसे संसार मे सनातन धर्म स्थापित किया?★★ ★★सनातन वैदिक हिन्दूधर्म मे वर्तमान शंकराचार्य तथा इनकी परम्परा का क्या महत्व है?★★ #यह_लेख_प्रत्येक_सनातनी_हिन्दू_तक_जाना_चाहिए। आज सोशल मीडिया पे जिसतरह से हम #सनातनी_वैदिक_हिन्दुओं_के_सर्वोच्च_धर्माभिभावक_धर्मगुरु_पूज्य_शंकराचार्यों एवं नारायण से चली आ रही आज तक की गुरु परम्परा जिसके मध्य में ( 2500 वर्ष पूर्व) श्रीमदाद्यजगद्गुरु शंकराचार्य जी हैं जो शिव के अवतार हैं जिनका वर्णन पुराणों में है और जो बार बार अपने पीठों पर बैठे आचार्यों के रूप में अभिव्यक्त होते हैं, को संघ की विचारधारा का प्रचार करने वाले सिकरवार,पाणिनि, अभिजीत जैसे स्वयंसेवक गालियाँ दे रहे हैं, अपने वाल से संघ की शाखा में संस्कारित हजारों स्वयंसेवकों से गालियाँ दिलवा रहे हैं, हिन्दुओं की आर्थिक, सामाजिक दुर्दशा के लिए अपनी पसन्दीदा राजनैतिक पार्टी, राजसत्ता के बचाव लिए लोगों का ध्यान भटका कर मान्य धर्मसत्ता के पूज्य शंकराचार्यों के ऊपर अनर्गल अनुचित सवाल कर रहे हैं। उससे आम जनता में बहुत भ्रम फैल रहा है। सच तो यह है कि आज संघियों को यही नही पता है कि धर्म क्या है? धर्म के लिए प्रमाण क्या है? हिन्दुओं के असली धार्मिक अभिभावक, धार्मिकनेता कौन हैं? बस ये लोग संघ के शाखा में वैदिक धर्म का पालन करने वाले साधु, संतों, आचार्यों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों आदि को गालियाँ देना सीखें हैं। स्वयं को धर्मज्ञाता बोलकर मनगढन्त पुस्तकें लिखना और उससे धनार्जन करना इनका कार्य है और मूर्ख हिन्दुओं का झुण्ड इनको पढ़कर एक काल्पनिक धर्म को सत्य मानकर आचरण चिन्तन करने लगती है जिससे आज सबसे ज्यादा सनातन धर्म की क्षति हो रही है। आइये जानते हैं कि शंकराचार्य जी के संक्षिप्त इतिहास के विषय मे, शंकराचार्य वास्तव में कौन हैं? बात है आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व की जब भारत मे जैन, बौद्ध, कापालिक आदि प्रमुख अवैदिक नास्तिक मतों सहित लगभग 72 बड़े अवैदिक मनमाने मत पंथ हो गए थें और यदि छोटे बड़े सभी अवैदिक मतों की संख्या देखी जाए तो लगभग 1300 से अधिक मत पंथ हो गए थें सम्पूर्ण धरा पर कुकुरमुत्ते के तरह ये सनातन धर्म विरोधी मत उग आए थें। इन अवैदिकों ने सनातन धर्मियों के मठ, आश्रम, गुरुकुल, मन्दिर आदि सब नष्ट कर दिए थें। आप सोचिए कि जब भारत के सबसे बड़े तीर्थ स्थल चारों धाम को ही इन्होंने नष्ट कर दिया था तो बाकी अन्य मन्दिरों की क्या स्थिति होगी? तत्कालीन चक्रवर्ती सम्राट महाराज सुधन्वा लिखते हैं कि जैनियों ने तो भगवान् कृष्ण के पौत्र वज्रनाभ द्वारा बनाया भगवान् कृष्ण का सुंदर मन्दिर नष्ट कर दिया था जिसे शंकराचार्य जी ने बहुत सुंदर मन्दिर बनाकर उसमें पुनः श्रीकृष्ण को प्रतिष्ठित किया। चारों ओर जन्मना जाति वर्णाश्रम की क्षति हो चुकी थी। भारत मे सनातनधर्मी लगभग समाप्त हो चुकें थें, कुलीन ब्राह्मण क्षत्रियों पर अत्याचार हो रहे थें सम्पूर्ण भारत मे चारों ओर इन अवैदिकों ने त्राहि त्राहि मचा दिया था। भारत में सर्वत्र अत्याचार, व्यभिचार, पापाचार व्याप्त हो गया था। सनातनियों को अवैदिक मत स्वीकारने के लिए बाध्य किया जाने लगा अन्यथा हत्या की जाने लगी, स्त्री, भूमि धन, सम्पत्ति आदि का हरण किया जाने लगा ऐसा वातावरण तैयार हो गया था मानो सनातनधर्म इस धरा पर अपने अन्तिम श्वांस ले रहा हो। ऐसे में भगवान् शिव धरा पर अवतार लेते हैं और भारत के एक कोने में केरल के कालड़ी नामक गाँव मे एक ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न होकर कुछ ही वर्षों में सनातन धर्म के समस्त धर्मग्रंथों, समस्त विद्याओं, समस्त कलाओं का अध्ययन करके 8 वर्ष की आयु में घर से निकल गए और आगे उत्तर भारत मे नर्मदा किनारे सांकल घाट पे गुरु प्राप्त कर सन्यास दीक्षा लेकर आगे काशी में व्यास जी से भेंट कर महाभाष्य लिखकर , संसार के समस्त अवैदिक अधर्मी मतों पन्थों को शास्त्रार्थ की चुनौती देकर दिग्विजय करने निकल गए। जैसे राजसत्ता का एक शासक चक्रवर्ती होने के लिए संसार के समस्त राजाओं को ललकार कर चुनौती देता है और दिग्विजय करता है उसी प्रकार आचार्य शंकर ने बचे खुचे हम सनातनियों को सनातन धर्म के पुनर्प्रतिष्ठा का भरोसा दिलाकर हमारे प्रतिनिधि बनकर संसार के समस्त अधर्मी पापी अवैदिक मतों एवं मतावलंबियों को ललकारकर, चुनौती देकर उनसे शास्त्रार्थ रूपी युध्द के लिए अकेले चल पड़े। परिणाम यह हुआ कि देखते ही देखते आचार्य वैदिक अद्वैत ज्ञान रूपी प्रकाश से भारत के समस्त अन्धकार रूपी हजारों अवैदिक मत पंथ लुप्त लगे। शंकराचार्य जी ने सभीको धर्म का वास्तविक शुद्ध अर्थ समझाकर सबको अपने शरणागत कर शिष्यत्व प्रदान कर दिया और जिन्होंने हारकर भी छल करना चाहा उनके लिए महाराज सुधन्वा की सेना काल बन गयी। शंकराचार्य जी ने चारों वर्णों को पुनर्प्रतिष्ठित कर दिया। राजाओं के बुद्धि का शोधन करके उनकी राजतंत्र की व्यवस्था भी वैदिक रीति से संचालित करवा दिया। सनातनधर्म के सभी सम्प्रदायों के झगड़ों को समाप्त कर अद्वैत सिद्धान्त को शास्त्र के बल पर सिद्ध कर यह बतला दिया कि एक ही ब्रह्म निर्गुण निराकार और सगुण साकार( शिव शक्ति विष्णु गणेश सूर्य आदि) के रूप मे व्यक्त होते हैं। ये शिवादी पँच देव भी एक ही सगुण साकार परब्रह्म परमात्मा के अलग अलग कारणों से अलग अलग स्वरूप हैं और इस प्रकार सनातन धर्मियों के समस्त आपसी विवाद भी समाप्त कर दिया। शास्त्र सम्मत वैदिक रीति से जन्मना जाति व्यवस्था को पुनर्स्थापित कर सबको जन्म से ही जीविका, स्वास्थ, शिक्षा, रक्षा, न्याय आदि जीवन के समस्त मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रबंध कर दिया। और इस प्रकार सम्पूर्ण धरा पर पुनः सतयुग के समान पापमुक्त मानव समाज की रचना हो गयी। इस प्रकार समस्त मतों पंथों को शास्त्रार्थ मे पराजित करके आचार्य शंकर विश्व के गुरुपद पर प्रतिष्ठित हो गए। आचार्य की विद्वत्ता से डरकर कुछ अवैदिक बौद्ध जैनी आदि समुद्र पार भागकर छुप गए। आचार्य ने समुद्री सीमा तक उनको ललकारते हुए आगे बढ़ते रहें पर आचार्य के सामने इनकी आने की हिम्मत नही हुई और फिर शास्त्र मर्यादा को देखते हुए आचार्य ने समुद्र का उलंघन न किया और शास्त्रार्थ से भागने पर, राजाओं ने इन अवैदिक अधर्मियों को हारा हुआ घोषित कर दिया। इस प्रकार आगे समस्त भारत मे वेद सम्मत धर्म, कर्म, उपासना की स्थापना हो गयी इनके द्वारा तोड़े गए समस्त मन्दिरों की वैदिक पद्धति से शिवावतार विश्वगुरु आचार्य शंकर ने प्रतिष्ठा कर दी। आचार्य शंकर के दिग्विजय कर लेने के पश्चात तत्कालीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट ने भारत के समस्त नागरिकों को एक आदेश दिया है। जिसे ताम्रपत्र में अंकित कराया और उसे ताम्रपत्र शासनादेश कहते हैं। भारत के समस्त हिन्दुओं को विशेषकर ब्राह्मणों और क्षत्रियों को यह ताम्रपत्र शासनादेश अवश्य पढ़ना चाहिए और यह जानना चाहिए कि हमारे पूर्वजों ने किसे स्वीकार किया था। यह भी सबको समझ लेना चाहिए कि माहेष्मती के सम्राट महाराज सुधन्वा सोमवंशी चूड़ामणि सम्राट युधिष्ठिर की परंपरा से प्राप्त न केवल चक्रवर्ती सम्राट थें बल्कि आचार्य शंकर के तरह ही वह इन्द्र के अवतार भी थें अतः उनका निर्णय हम आज धरातल पर माने या माने पर यमराज तो मानेंगे ही और यदि हम महाराज सुधन्वा की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं तो नर्क में हमारा विशेष ध्यान तो रखा ही जाएगा साथ मे पितृ लोक में बैठे हमारे पूर्वज भी उनके वंशजो द्वारा उनके बनाये मर्यादा सिद्धान्त के विपरीत जाने के कारण हमें श्रापते होंगे, धिक्कारते होंगे। यह शास्त्र सिद्ध है। ताम्रपत्र भारतीयों के लिए वो धरोहर है जो उन्हें भारत के एक नागरिक होने के नाते सदैव उनके पूर्वज सम्राट के दिये आदेशों के पालन के लिए शिक्षित और प्रेरित तो करता ही रहेगा साथ में उस समय की परिस्थिति और हमारे पूर्वजों के प्रयास को भी सदैव याद कराता रहेगा। जब सम्पूर्ण भारत स्थिर और सुरक्षित हो गया तो भविष्य की चिन्ता लिए भारत के नागरिकों ने महाराज सुधन्वा से प्रार्थना की कि वो आचार्य शंकर से ऐसी व्यवस्था बनाने के लिए निवेदन करें जिससे सदैव के लिए भारत सुरक्षित हो जाये और पुनः सनातन धर्म की इस प्रकार हानि न हो पाए। इसको देखते हुए राजसत्ता के शासक चक्रवर्ती सम्राट ने सर्वप्रथम आचार्य शंकर को निवेदन किया कि वो दिग्विजय कर चुके हैं अर्थात दिशाओं को जीत लिए हैं अर्थात समस्त दिशाओं में समस्त मतों पंथों विचारों को शास्त्रार्थ के बल पर गलत सिद्ध करके सनातन वैदिक अद्वैत मत को सप्रमाण सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर चुके हैं अतः इस मत के दिग्विजयी धर्माचार्य होने के नाते और विश्व के समस्त मतों के आचार्यों को शास्त्रार्थ में हराकर अपना शिष्यत्व स्वीकार करवा देने के कारण वो विश्व के गुरु हो चुके हैं इसलिए धर्मसत्ता के चक्रवर्ती सम्राट विश्वगुरु होने के नाते देवेन्द्र की भांति राजचिन्ह धारण कर समस्त विश्व पर शासन करें और यह शासन राजसत्ता के समस्त शासकों पर भी होगा। महाराज सुधन्वा के निवेदन पर आचार्य ने छत्र, चँवर, सिंहासन, धर्मदण्ड आदि राजचिन्ह धारण किया। लोगों की प्रार्थना पर आचार्य शंकर ने पहले ही चारों दिशाओं में चार वेदों के संरक्षण के लिए चार आम्नाय पीठों/मठों की स्थापना कर दी थी और फिर उन पीठों/मठों के संचालन के लिए आचार्य ने एक संविधान बनाया जिसका नाम दिया #मठाम्नाय_महानुशासनम्। आज भी महाराज सुधन्वा का वो "#ताम्रपत्र_शासनादेश" और आचार्य शंकर द्वारा रचित "मठामान्य महानुशासनम्" हमें पूर्वजों के द्वारा प्राप्त है। महाराज सुधन्वा का ताम्रपत्र विज्ञप्ति पढ़ते हुए आपका रोम रोम कम्पायमान हो जाएगा। सम्राट ने हम सनातनियों सहित स्वयं सदैव के लिए आचार्य के दासत्व को स्वीकार कर लिया मानो कोई अभिभावक अनन्त काल के लिए अपने संतान को किसी ऐसे महापुरष को सौप दिया जो सदैव के लिए उसके सन्तान का भरण पोषण करता रहे इसी प्रकार हमारे सम्राट ने अपने विश्व के प्रजा को स्वयं सहित आचार्य के चरणों में सदैव के लिए समर्पित कर दिया जिससे सदा सदा के लिए सम्राट की प्रजा और उनके वंशजो का समस्त लौकिक पारलौकिक कल्याण होता रहे। आचार्य ने भी सुधन्वा के निवेदन को स्वीकार करते हुए मानवों के कल्याण के लिए चारों पीठों पर बैठे सन्यासी के रूप में सदैव के लिए स्वयं को ही स्थापित करने का वचन दे दिया और स्वयं भगवान कृष्ण के गीतोपदेश की भांति यह ललकार के घोषणा कर दिया कि कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायामृषिसत्तम: । द्वापरे व्यास एव स्यात् कलावत्र भवाम्यहम् ।। अस्मतपीठसमारुढ: परिव्राडुक्तलक्षण: । अहमेवेति विज्ञेयो 'यस्य देव' इतिश्रुते: ।। अर्थात सतयुग में ब्रह्मा, त्रेता में मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ, द्वापर मे वेदव्यास तथा कलयुग मे मैं (शंकराचार्य) ही जगद्गुरु हूँ। मेरे द्वारा बताए गए लक्षणों से सम्पन्न सन्यासी मेरे पीठ (चारों पीठों) पर आसीन हो तो उसे मैं (शङ्कर) ही हूँ (इस प्रकार मेरा ही स्वरूप )समझना चाहिए, क्योंकि इस सम्बन्ध में यस्य देव श्रुति प्रमाण है। यस्य देवे पराभक्तिर्यथादेवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।।(श्वेताश्वतरोपनिशद् अ. 6/23) महाराज सुधन्वा अपने ताम्रपत्र शासनादेश में घोषणा करते हैं- #भगवद्भिर्दिग्विजयोऽकारि। भगवत्पाद ने दिग्विजय कर लिया है अर्थात दिशाओं को जीत लिया है। #सर्वे_वादिनः_पराकृता। सभी वादी हार चुके हैं। आगे अपने ताम्रपत्र शासनादेश में कहते हैं- #सर्वे_वयं_तत्तन्मण्डलस्थाब्रह्मक्षत्रादयस्तत्तन्मण्डलस्यैवाचार्यस्यखधिकाराधिकृता_वर्तिष्यामहे_च। अर्थात हम सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि(चारों वर्ण) जिस पीठ के क्षेत्र में आते हैं उन क्षेत्र के अधिकारी आचार्यों (शंकराचार्यों) की आज्ञा का पालन करते हुए व्यवहार करें। #अस्मद्राजसत्तेव_निरङ्कुशगुरुसत्ताप्युक्तमर्यादया_जगत्यविचलं_विचलतु। हमारी राजसत्ता के समान बिना किसी रुकावट के गुरुसत्ता मर्यादानुसार संसार में अविचल रूप से अच्छी तरह चलती रहे। #इत्येवमादिनियमबन्धे_भगवदाज्ञासमवबुद्धस्समस्तैरथास्मदादिब्रह्मक्षत्रादिवंशोद्भवैः परमप्रेम्णोत्तमाङ्गेनाद्रियत इत्येतां विज्ञप्तिमङ्गीकुर्वन्तु भगवन्त इति स्वस्त्यस्तु लोकेभ्यः। भगवत्पाद के आज्ञानुसार नियमों में बँधे हुए हम सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय (चारों वर्ण)आदि वंशो में उत्पन्न हुए लोग परमप्रेम से इस आज्ञा को स्वीकार करते हैं। इस विज्ञप्ति को भगवन् स्वीकार करें। विश्व का कल्याण हो। सम्राट सुधन्वा सम्राट सुधन्वा के ताम्रपत्र प्रमाण से यह सिद्ध हो गया कि शंकराचार्य जी ने हम सनातनियों को बचाने के लिए क्या कुछ नही किया कितना कष्ट सहा और बहुत कम समय मे किस प्रकार हम हिन्दुओं को बचाकर हमारे जन्मना जाति वर्णधर्म के अनुसार भारत की सामाजिक व्यवस्था रच दी। और ब्राह्मण क्षत्रिय आदि सभी वर्णों को अपने अपने पीठों के शंकराचार्य को गुरु मानकर उनकी आज्ञा के अनुसार चलने का आदेश दे दिया। शंकराचार्य जी ने भी घोषणा कर दी और कह दिया कि कलयुग में मैं ही जगद्गुरु हूँ और मेरे द्वारा बनाए चारों पीठों में यदि मेरे द्वारा बताए गए लक्षणों से युक्त सन्यासी अभिषिक्त होता है तो उसके रूप मे मैं ही विराजमान हो जाता हूँ। और उसे मैं अपना नाम(शंकराचार्य) दे देता हूँ। अतः इससे सिद्ध हो गया कि वर्तमान में चार ही पीठ मान्य हैं और उसपे विराजमान आचार्यों में शिवावतार शंकराचार्य ही प्रतिष्ठित हैं। इस दृष्टि से हमें चारों पीठों के आचार्यों को भगवान् शिव का स्वरूप जान कर उनकी पूजा, दर्शन उनके आदेशों का पालन करना चाहिए। यह भी सिद्ध है कि जिन सिद्धान्तों के बल पर आद्य जगद्गुरु ने विश्व विजय किया था अर्थात दिग्विजय किया था वो सिद्धान्त आज भी पीठों के आचार्यों के द्वारा प्रकट हैं और आजतक किसी शंकराचार्य को कोई भी शास्त्रार्थ में हरा नही सका इसलिए आज भी शंकराचार्य ही केवल जगद्गुरु हैं। आगे शंकराचार्य के आदेश से ही चारों धर्मराजधानियों के आचार्य सम्राट के भातिं राजचिन्ह धारण करते हैं इनपर सामान्य सन्यासियों के नियम नही लगते अपितु ये सर्वश्रेष्ठ सर्वोच्च और सर्व विशेष होते हैं। शंकराचार्य जी ने अपने चारों पीठों के आचार्यों को जो आदेश दिया है उससे यह सिद्ध हैं कि आज के चारों पीठों के शंकराचार्य ही धर्मसत्ता के धर्मसम्राट हैं। सुधन्वनः समौत्सुक्यनिवृत्त्यै धर्महेतवे। देवराजोपचारांश्च यथावदनुपालयेत् ।। अर्थात सम्राट सुधन्वा की उत्कंठा की शान्ति तथा धर्म की रक्षा के लिए(शंकराचार्यों को चाहिए कि वे) "देवराज इंद्र की उपचारों को धारण करें अर्थात इन्द्र के भांति राजचिन्हों-छत्र, चामर, सिंहासन आदि को यथावत धारण करें। नोट:- 1.आज जितने भी लोग स्वयं को जगद्गुरु कहते हैं और सिंहासन आदि राजचिन्ह धारण करते हैं वो सब शंकराचार्य की ही नकल करके करते हैं जो कि पाखण्ड और कपट मात्र है शंकराचार्यों के अलावा किसी को यह अधिकार नही है कि वो यह सब धारण करें और अपने नाम में जगद्गुरु लिखे न ही ऐसा करने का अन्य मत संप्रदाय मे कही कोई प्रमाण मिलता है। 2. चित्र में महाराज सुधन्वा का ताम्रपत्र शासनादेश उसके हिंदी अंग्रेजी अनुवाद सहित है। 3. मुझ लेखक ले नाम सहित यह लेख अपने वाल पर कॉपी, शेयर कर सकते हैं। जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान की जय हर हर महादेव ✍️दीपक कुमार केशरी Sanatani Vaidik #सनातनी

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